जीवन की मुस्कान

जीवन की मुस्कान

एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन दोंनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा- आपके लिए क्या लाना है?

उस व्यक्ति ने कहा- “मैंने मेरी बेटी को वादा किया था कि यदि तुम कक्षा दस में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हें शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा। इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ।” वेटर ने पूछा- “आपके लिए क्या लाना है?” उसने कहा- “मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।” पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा- “मैं इन दोनों को भर पेट नास्ता कराना चाहता हूँ। अभी मेरे पास पैसे नहीं है, इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलेरी से काट लेना।” मालिक ने कहा- “आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की पार्टी देंगे।”

होटल वालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहकों के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया। मालिक ने उन्हें एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना सम्मान पाकर आंखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए।

समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की I.A.S. की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई।उसने सबसे पहले उसी होटल में एक सिपाही भेज कर कहलाया कि कलेक्टर साहिबा नास्ता करने आयेंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया।यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया।

कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कुराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची। सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए। होटल के मालिक ने उन्हें गुलदस्ता भेंट किया और ऑर्डर के लिए निवेदन किया। उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस वेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- “शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं। मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिसाल पेश करते हुए मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी। आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ। आप दोनों का एहसान मैं सदैव याद रखूंगी। आज यह पार्टी मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी। कल आप दोनों को “” श्रेष्ठ नागरिक “” का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा।

💐💐शिक्षा-💐💐

किसी भी गरीब की गरीबी का मजाक बनाने के बजाय उसकी प्रतिभा का उचित सम्मान करें। संभव है आपके कारण कोई गुदड़ी का लाल अपनी मंजिल तक पहुंच जाए।

सदैव प्रसन्न रहिये
जो प्राप्त है,पर्याप्त है!!

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏

दो अनमोल हीरे

दो अनमोल हीरे

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा!

सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया!

घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया!

कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला!

नौकर चिल्लाया, “मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!”

सौदागर भी हैरान था! उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे!

सौदागर बोला: “मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!”

नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है!

बोला: “मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!”
लेकिन
सौदागर ने नौकर की एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी!

अपनी हीरों कि थैली पाकर ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था और बोला, “मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे! अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए!

सौदागर बोला, “मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!”

जितना सौदागर मना करता जा रहा था; ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था!

आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे!

इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया!

लेकी यह क्या! वह बड़ी पशोपेश में बोला, “मेरे सारे हीरे तो यही हैं तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?”

सौदागर बोला: वह दो हीरे है – “मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी!

सार्वभोमिक सत्य है कि आज भी जिन जिन के पास ये दो हीरे हैं – वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं!

🙏🏻🙏🙏🏿 सुप्रभात🙏🏾🙏🏽🙏🏼

माँ लक्ष्मी ने आगे कहा – जिस परिवार में गुरुजनों का सत्कार होता है; दुसरों के साथ जहाँ सभ्यता पूर्वक बात की जाती है और मुख से बोलकर कोई कलह नहीं करता मैं वहीं पर वास करती हूँ!

एक सेठ को स्वप्न में माँ लक्ष्मी ने दर्शन दिये और कहा – सेठ! अब तेरे पुण्य समाप्त हो गये हैं, इसलिए तेरे घर से कुछ ही दिनों में मैं चली जाऊँगी. तुझे मुझसे जो माँगना है, वह माँग ले!🌻

सेठ ने कहा- कल सुबह अपने कुटुम्ब के लोगों से विचार-विमर्श करके जो माँगना होगा – माँग लूँगा!🌷

सेठ ने सुबह स्वप्न की बात अपने परिवार के लोगों को बताई! परिवार के लोगों में से किसी ने वाहन माँगने को कहा तो किसी ने सोना-चाँदी तो किसी ने हीरे-मोती माँगने को कहा!

अन्त में सेठ की सबसे छोटी पुत्र-वधु बोली – पिता जी! जब लक्ष्मी को जाना ही है तो ये सब वस्तुएँ मिलने पर कहाँ रह पायेंगी?
आप इन्हें माँगेगे तो भी ये मिलेंगी नहीं! आप तो बस यही माँगिये कि परिवार में प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में परस्पर प्रेम बना रहेगा तो विपत्ति के दिन भी सरलता से कट जायेंगे!

सेठ को छोटी पुत्र-वधू की बात पसन्द आई! दूसरी रात्रि में स्वप्न में उन्हें फिर से माँ लक्ष्मी के दर्शन हुए!

सेठ ने प्रार्थना की – देवी! आप जाना चाहती हैं तो प्रसन्नता से जायें; किन्तु यह वरदान दें कि हमारे कुटुम्ब में परस्पर प्रेम बना रहे!

माँ लक्ष्मी बोलीं – सेठ! ऐसा वरदान माँग कर तुमने मुझे बाँध ही लिया है! जिस कुटुम्ब (परिवार) के सदस्यों में परस्पर प्रेम है, वहाँ से मैं कैसे जा सकती हूँ?

माँ लक्ष्मी ने आगे कहा – जिस परिवार में गुरुजनों का सत्कार होता है; दुसरों के साथ जहाँ सभ्यता पूर्वक बात की जाती है और मुख से बोलकर कोई कलह नहीं करता मैं वहीं पर वास करती हूँ!
🌷🌷🌹

मौन और अभिमान !

मौन और अभिमान !

एक राजा के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया। राजकुमार स्वभाव से ही कम बोलते थे। राजकुमार जब युवा हुआ तब भी अपनी उसी आदत के साथ मौन ही रहता था । राजा अपने राजकुमार की चुप्पी से परेशान रहते थे की आखिर ये बोलता क्यों नहीं है | राजा ने कई ज्योतिषियों, साधु-महात्माओं एवं चिकित्सकों को उन्हें दिखाया परन्तु कोई हल नहीं निकला। संतो ने कहा कि ऐसा लगता की पिछले जन्म में ये राजकुमार कोई साधु थे जिस वजह से इनके संस्कार इस जन्म में भी साधुओं के मौन व्रत जैसे हैं। राजा ऐसी बातों से संतुष्ट नहीं हुए।

एक दिन राजकुमार को राजा के मंत्री बगीचे में टहला रहे थे। उसी समय एक कौवा पेड़ कि डाल पे बैठ कर काव – काव करने लगा | मंत्री ने सोचा कि कौवे कि आवाज से राजकुमार परेशान होंगे इसलिए मंत्री ने कौवे को गोली मार दी | गोली लगते ही कौवा जमीन पर गिर गया। तब राजकुमार कौवे के पास जा कर बोले कि यदि तुम नहीं बोले होते तो नहीं मारे जाते। इतना सुन कर मंत्री बड़ा खुश हुआ कि राजकुमार आज बोले हैं और तत्काल ही राजा के पास ये खबर पहुंचा दी। राजा भी बहुत खुश हुआ और मंत्री को खूब ढेर – सारा उपहार दिया।

कई दिन बीत जाने के बाद भी राजकुमार चुप ही रहते थे। राजा को मंत्री कि बात पे संदेह हो गया और गुस्सा कर राजा ने मंत्री को फांसी पे लटकाने का हुक्म दिया। इतना सुन कर मंत्री दौड़ते हुए राज कुमार के पास आया और कहा कि उस दिन तो आप बोले थे परन्तु अब नहीं बोलते हैं। मैं तो कुछ देर में राजा के हुक्म से फांसी पे लटका दिया जाऊंगा |

मंत्री कि बात सुन कर राजकुमार बोले कि यदि तुम भी नहीं बोले होते तो आज तुम्हे भी फांसी का हुक्म नहीं होता। बोलना ही बंधन है। जब भी बोलो उचित और सत्य बोलो अन्यथा मौन रहो | जीवन में बहुत से विवाद का मुख्य कारण अत्यधिक बोलना ही है | एक चुप्पी हजारो कलह का नाश करती है |
कहा भी गया है कि –
जब जीवन में समझ बढ़ती है तो
इंसान मौन रहना पसंद करता है,
पर जब अभिमान बढ़ता है तो
इंसान अधिक बोलना पसंद करता है।
और
यह अभिमान और बडबोलापन ही था
जिसने
महाज्ञानी रावण का सर्वनाश कर डाला!

🌹🌹🙏आपको दशहरा पर्व की हार्दिक शुभ कामनाएं🙏🌹🌹*

बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए।

बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए। *

समस्त अंतापुर रो पड़ा अपने राजकुमार की याद में!ऐसा कोई प्रजाजन नहीं था जिसने सुकर्णव की अर्थी देख आँसू ना बहाए हों।

दाह संस्कार संपन्न हुआ। पुत्र शोक अब प्रतिशोध की ज्वाला में भड़क उठा और महाराज वेनुविकर्ण ने कारागृह से बंदी बहेलिया को उपस्थित करने का आदेश दिया।

बहेलिया लाया गया। महाराज ने तड़पते हुए पूछा – दुष्ट बहेलियां! तूने राजकुमार का वध किया है, बोल तुझे मृत्युदंड क्यों न दिया जाए?

बहेलिया ने एक बार सभा भवन में बैठे हर व्यक्ति पर दृष्टि दौड़ाई। फिर राजपुरोहित पर एक क्षण को उसकी दृष्टि ठहर गई। उसे कुछ याद आया!

बहेलिए ने कहा – “महाराज मेरा इसमें क्या दोष?  मृत्यु ने राजकुमार को मारने का निश्चय किया था! मुझे माध्यम बनाया! मेरी बुद्धि भ्रमित की और मैंने राजकुमार को कस्तूरी मृग समझकर तीर छोड़ दिया! जो दंड आप मुझे देना चाहते हैं – वही मृत्यु को दें। चाहे तो राजपुरोहित से पूछ ले!

यह भी तो कहते हैं कि विधाता ने जितनी आयु लिख दी – उसे कोई घटा या बढ़ा नहीं सकता। घटनाएं तो मृत्यु के लिए मात्र माध्यम होती हैं।”

विकर्ण का क्रोध विस्मय में बदल गया। उन्होंने राजपुरोहित की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि सचमुच वे भी बहेलिया का मूक समर्थन कर रहे हैं।

उन्होंने मृत्यु का आव्हान किया! मृत्यु उपस्थित हुई । महाराज ने उससे पूछा- “आपने राजकुमार को मारने का विधान क्यों रचा?”
“उनका काल आ गया था! मृत्यु बोली।”

तो फिर काल को बुलाया गया।

काल ने कहा,- “मैं क्या कर सकता था – महामहिम *!!
यह तो राजकुमार के कर्मों का दोष था। कर्मफल से कोई बच नहीं सकता। राजकुमार ही उसके अपवाद कैसे हो सकते थे ?”

कर्म की पुकार की गई।

उसने उपस्थित होकर कहा – “आर्य श्रेष्ठ!अच्छा हूँ या बुरा – मैं तो जड़ हूं। मुझे तो आत्म चेतना चलाती है! उसकी इच्छा ही मेरा अस्तित्व है। आप राजकुमार की आत्मा को ही बुला कर पूछ लें! उन्होंने मुझे क्रियान्वित ही क्यों किया? “

और अंत में राजकुमार की आत्मा बुलाई गई।

दंड नायक ने प्रश्न किया- भन्ते! जब तुम कर्ता की स्थिति में थे! क्या यह सच है कि तुमने कोई ऐसा कार्य किया- जिसके फलस्वरूप तुम्हें अकाल, काल-कबलित होना पड़ा?

शरीर के बंधन से मुक्त, आकाश में स्थिर, राजकुमार की आत्मा थोड़ा मुस्कुराई ! फिर गंभीर होकर बोली -“राजन! पूर्व जन्म में, मैंने इसी स्थान पर मांस भक्षण की इच्छा से एक मृग का वध किया था। मृग में मरते समय प्रतिशोध का भाव था! उसी भाव ने बहेलिया को भ्रमित किया! इसीलिए बहेलिये का कोई दोष नहीं, ना मुझे काल ने मारा है। 🕉️मनुष्य के कर्म ही उसे मारते और जलाते हैं,🕉️ इसीलिए तुम मेरी चिंता छोडो़, कर्म की गति बड़ी गहन है। अपने कर्मों का हिसाब करो।भावी जीवन की प्रगति और उससे स्वर्ग मुक्ति, सब कर्म की गति पर ही आधारित है। सो तात!  तुम भी अपने कर्म सुधारो।
इसीलिय कहा गया है कि –
कर्म प्रधान विश्व रची रखा!
जो जस करहीं सो तस फल चाखा!!
🙏🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏

संगत का असर

संगत का असर

एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला! थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था! तो डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी!

वहीं से एक अति सुन्दर हंस उड़कर जा रहा था! उस हंस ने देखा कि वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें।

जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, * इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया।

तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था! मैं तो आपको छाँव दे रहा था और आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष?

तब समय उस शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ हो आपकी सोच भी आपके तन की तरह ही सुंदर हैं! आपके संस्कार शुद्ध हैं! यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे लेकिन आपसे एक गलती हो गयी कि जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था।

उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया हैं ।

संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, बुद्धि और कार्य से परमहंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये!
कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है।
व्यक्ति को जीवन के अंतिम क्षणों में गति भी उसकी संगति के अनुसार ही मिलती है। संगति का जीवन में बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। संगति से मनुष्य जहां महान बनता है, वहीं बुरी संगति उसका पतन भी करती है।

छत्रपति शिवाजी बहादुर बने। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी मां ने उन्हें वैसा वातावरण दिया।
नेपोलियन जीवन भर बिल्ली से डरते रहे, क्योंकि बचपन में बिल्ली ने उन्हें डरा दिया था।
माता-पिता के साथ-साथ बच्चे पर स्कूली शिक्षा का गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार व्यक्ति पढ़ाई-लिखाई करके उच्च पदों पर पहुंच तो जाता है, लेकिन संस्कारों के अभाव में, सही संगति न मिलने के कारण वह हिटलर जैसा तानाशाह बन जाता है।
सदाचरण के पालन से चाहे तो व्यक्ति ऐसा बहुत कुछ कर सकता है, जिससे उसका जीवन सार्थक हो सके, परंतु सदाचरण का पालन न करने से वह अंतत: खोखला हो जाता है।

हो सकता है कि चोरी-बेईमानी आदि करके वह धन कमा ले, कुछ समय के लिए पद-प्रतिष्ठा अर्जित कर ले, लेकिन उसका अंत बुरा ही होता है।
सत्संगति का, अच्छे विचारों का बीज बच्चे के मन में बचपन में ही बो देना चाहिए।
व्यक्ति की अच्छी संगति से उसके स्वयं का परिवार तो अच्छा होता ही है, साथ ही उसका प्रभाव समाज व राष्ट्र पर भी गहरा पड़ता है।

जहां अच्छी संगति व्यक्ति को कुछ नया करते रहने की समय-समय पर प्रेरणा देती है, वहीं बुरी संगति से व्यक्ति गहरे अंधकूप में गिर जाता है।

अच्छी संगति व्यक्ति का मन व चित्त निर्मल करती है। उसकी प्रसन्नता बनी रहती है। दिन-प्रतिदिन उसके व्यक्तित्व में निखार आता है।
संगति कैसी है, इस बात से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है। जीवन का हर कदम मायने रखता है।

इसलिए उसे फूंक-फूंककर आगे बढ़ना चाहिए।

अक्सर ऐसा देखने में आता है कि कुछ बच्चे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन बुरी संगति में फंसकर नशा या मद्यपान करने लगते हैं। उनका जीवन बर्बाद हो जाता है। वे झूठी चकाचौंध में फंसकर स्वयं की वास्तविक शक्ति को नहीं पहचानते हैं। कई बार सत्संगति न मिलने के कारण उपयुक्त वातावरण न होने के चलते बच्चा अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाता, जबकि सत्संगति से उसमें अटूट विश्वास जगता है और वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏🏼

बदलाव – अपने में

बदलाव – अपने में

बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?”

“कुछ नहीं , बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था!”, दादा जी बोले ।

“जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न …” बच्चों ने ज़िद्द् की।

दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थ , मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी, मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था!

जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ – बुद्धि कुछ बढ़ी तो सोचने लगा कि ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है!
इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया! सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ!

पर जब कुछ और समय बीता- मैं अधेड़ होने को आया तो लगा कि ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है! हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है! चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ!

पर अफ़सोस कि मैं वो भी नहीं कर पाया !

और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता और हो सकता है मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता!

ये कहते-कहते दादा जी की आँखें नम हो गयीं और वे धीरे से बोले, “बच्चों ! तुम मेरी जैसी गलती मत करना! कुछ और बदलने से पहले खुद को बदलना बाकि सब अपने आप बदलता चला जायेगा!

सचमुच में, हम सभी में दुनिया बदलने की ताकत है पर इसकी शुरआत खुद से ही करनी होती है! कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा! हमें खुद को तैयार करना होगा! अपने कौशल को मजबूत करना होगा! अपने attitude को सकारात्मक बनाना होगा! अपने लक्ष्य को फौलाद करना होगा और तभी हम वो हर एक बदलाव ला पाएंगे जो हम सचमुच लाना चाहते हैं।
प्रेम रावत भी यही कहते हैं कि जब हर एक आदमी शांति का अनुबह्व करने लगेगा तो विश्व शांति स्वत हो जाएगी!
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माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की और कहा, भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।

लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी! भयंकर गङ्ढ था!

मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’

हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी पर उसने कुछ ध्यान न दिया।

फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘*हमारी यात्रा बड़ी सुखद हुई! साथी-संगी रहे, मित्रता बनी! अब मैं जाती हूं! कोई काम हो तो मुझे कहना!

तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी! उसने कहा, ‘तू कौन है – कुछ पता नहीं! कब तू आयी! कब तू मेरे शरीर पर बैठी! कब तू उड़ गयी – इसका भी मुझे कोई पता नहीं है।

लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी…

सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है तो हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन हम भी मक्खी कि तरह बड़ा शोरगुल मचाते हैं।
सोचने की बात है कि वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी?
वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, तू भी है! तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहती थी।

हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता! दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है।

इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि
किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें! हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।

हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये!
स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें!
धन इकट्ठा करते, मकान बनाते तो दूसरों को दिखाने के लिये
दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण।
हकीकत यही है कि-
हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे!
हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं!
वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं।

हमारा अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि उसे वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

इसलिय; याद रखना चाहिए कि आ*त्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा!
इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर जब तक जीवन है
सदभावना पूर्वक जीना चाहिए!
और
सबका सम्मान करना चाहिए!
क्योंकि
जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा  हैं।
🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

खुद का सुधार

खुद का सुधार

एक व्यक्ति अपने परिवार, रिश्तेदार, मित्र, मोहल्ला के निवासी, अपनी फैक्ट्री के कार्यकर्ताओं से अति दुःखी होकर समाधान हेतु अपने गुरु के पास पहुंचा और अपनी पीड़ा गुरुदेव को बताते हुए बोला- “मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेर आसपास के सभी लोग बेहद स्वार्थी हैं। कोई भी सही नहीं है, क्या करूं गुरुदेव?”

उस व्यक्ति की वेदना को समझ गुरुजी उसकी समस्या को भली-भांति समझ गए।मुस्कान के साथ उन्होंने कहा- “पुत्र, नि:संदेह तुम्हारी समस्या अति गंभीर है। समय रहते इसका समाधान आवश्यक है। तुम आज रात आश्रम में ही रहो। मैं रात्रि में मंथन करूंगा और सुबह समाधान बताऊंगा।”

उस व्यक्ति को अपने गुरु पर अटूट विश्वास था। उसने आश्रम में रात्रि विश्राम की बात स्वीकार ली और आश्रम के निवासियों के पास जा पहुंचा। भोर की पूजा-अर्चना के पश्चात अपने अन्य शिष्यों की समस्याओं को निबटा कर गुरुजी ने अंत में उस व्यक्ति को अपने पास बुलाया।
एक रात आश्रम में बिताने के अनुभव को भी वह व्यक्ति अपने गुरु को बताने से स्वय को रोक न सका और बोला- “गुरुदेव, आपके आश्रम में भी स्वार्थियों ने अपना डेरा जमा रखा है।हर कोई आपसे कुछ न कुछ चाहकर ही यहां रुका है।”

गुरुदेव ने उसकी हर बात को गंभीरता से सुना और अंत में कहा- “मैं एक कहानी सुना रहा हूं, उसे गंभीरता से सुनना। इस कहानी में ही तुम्हारी समस्या का समाधान छिपा है।

एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 1 हजार आईने लगे थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 1 हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं और वो उन बच्चों के प्रतिबिंब के रहकर खुश रहने लगी। जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते। उसने सोचा यह दुनियां की सबसे अच्छी जगह है और यहां वह बार बार आना चाहेगी।

बच्ची के प्रस्थान के पश्चात थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया। उसने अपने चारों तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है ।उसने कहा यह दुनियां की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी ।

ठीक इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे हैं।
जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है।
संसार हमें अपने मन के अनुरूप ही दिखता है
इसलिए
अपने मन और दिल को साफ़ रखें,
यक़ीनन तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग की तरह अनुभव होगी।
संसार को सुधारने की आकांक्षा रखने वालों के लिए
सर्वप्रथम आवश्यक है कि हम स्वयं में सुधार करें, संसार अपने आप सुधर जाएगा।
यही बात महाराजी भी कहते हैं कि
संसार को शांति नहीं चाहिय
अगर
हर एक व्यक्ति को शान्त होना होगा
तो
संसार में शांति स्वत: हो जाएगी!
🙏🙏🙏🌸🌸🙏🙏🙏

अपना-अपना भाग्य

अपना-अपना भाग्य

एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया। मालिक ने सोचा इसकी तन्खाह बढ़ा दी जाये तो यह और लगन से काम करेगा और उसकी तन्खाह बढ़ा दी।

अगली बार जब उसको तन्खाह से अधिक पैसे दिये, तो वह कुछ नहीं बोला चुपचाप पैसे रख लिये। कुछ महीनों बाद वह फिर अनुपस्थित हो गया। मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया, सोचा इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ, यह नहीं सुधरेगा और उसने बढ़ी हुई तन्खाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही तन्खाह दी। वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और कुछ ना बोला। मालिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने उससे पूछा कि जब मैंने तुम्हारे अनुपस्थित होने के बाद तुम्हारी तन्खाह बढ़ा कर दी तुम कुछ नहीं बोले और आज तुम्हारी अनुपस्थिति पर तन्खाह कम कर के दी फिर भी शान्त ही हो, इसकी क्या वजह है ?

उसने जवाब दिया, जब मैं पहले अनुपस्थित हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। आपने मेरी तन्खाह बढ़ा कर दी तो मैं समझ गया, परमात्मा ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेज दिया है और जब दोबारा मैं अनुपस्थित हुआ तो मेरी माता जी
का निधन हो गया था। जब आप ने मेरी तन्खाह कम दी तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का उनके साथ ही चला गया। अब मैं उस तनख्वाह के लिये क्यों चिन्तित होऊँ जिसका हिसाब स्वयं परमात्मा ने ले रखा है।

बहुत ही मजबूत रिश्ता है मेरे और भगवान के बीच में, ज्यादा मैं माँगता नहीं और कम वो देता नहीं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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