वास्तविक मूल्य

वास्तविक मूल्य

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त-महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता। एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये।

पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं?
सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं!

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है?
उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।
महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये।

मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।

पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं?

सेठ जी ने कहा महाराज ! मेरा एक पुत्र है।

महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है?
सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है।
महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी ! तुम्हारी आयु कितनी है?
सेठ ने कहा- महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है! महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी बोले बिना रह न सके और पूछने लगे – सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?
सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बतलाया कि, महाराज! झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे?

दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ?

तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा, चरण-शरण ग्रहण करके गुरु मान लिया , उनसे भजन-साधना की विधि समझी और मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

उस सेठ के विचारों को सुनकर महात्मा जी निरुत्तर हो गये!

संत कबीर भी यही कहते है –
कबीर संगत साध की, साहिब आवे याद।
लेखे में सोई घड़ी, बाकी दे दिन बाद।।

जब कभी सच्चे सन्त-महापुरुषों से मिलाप होता है, तब उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है, भजन की शुरुआत होती है। वास्तव में वही घड़ी सफल है, शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं!

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जगह का महत्व

जगह का महत्व

पिता ने बेटे से कहा, “तुमने बहुत अच्छे नंबरों से ग्रेजुएशन पूरी की है। अब क्यूंकि तुम नौकरी पाने के लिए प्रयास कर रहे हो , मैं तुमको यह कार उपहार स्वरुप भेंट करना चाहता हूँ, यह कार मैंने कई साल पहले हासिल की थी, यह बहुत पुरानी है। इसे कार डीलर के पास ले जाओ और उन्हें बताओ कि तुम इसे बेचना चाहते हो। देखो वे तुम्हें कितना पैसा देने का प्रस्ताव रखते हैं।”

बेटा कार को डीलर के पास ले गया, पिता के पास लौटा और बोला, “उन्होंने 60,000 रूपए की पेशकश की है क्योंकि कार बहुत पुरानी है।”

पिता ने कहा, “ठीक है, अब इसे कबाड़ी की दुकान पर ले जाओ।”

बेटा कबाड़ी की दुकान पर गया, पिता के पास लौटा और बोला, “कबाड़ी की दुकान वाले ने सिर्फ 6000 रूपए की पेशकश की, क्योंकि कार बहुत पुरानी है।”

पिता ने बेटे से कहा कि कार को एक क्लब ले जाए जहां विशिष्ट कारें रखी जाती हैं।

बेटा कार को एक क्लब ले गया, वापस लौटा और उत्साह के साथ बोला, “क्लब के कुछ लोगों ने इसके लिए 60 लाख रूपए तक की पेशकश की है! क्योंकि यह निसान स्काईलाइन आर34 है, एक प्रतिष्ठित कार, और कई लोग इसकी मांग करते हैं।”

पिता ने बेटे से कहा, “कुछ समझे? मैं चाहता था कि तुम यह समझो कि सही जगह पर ही तुम्हें सही महत्व मिलेगा। अगर किसी प्रतिष्ठान में तुम्हें कद्र नहीं मिल रही, तो गुस्सा न होना, क्योंकि इसका मतलब एक है कि तुम गलत जगह पर हो।

शिक्षा:-सफलता केवल अपने हुनर और परिश्रम से नहीं मिल जाती, लोगों के साथ मिलती है, और तुम किन लोगों के बीच में हो , कुछ समय में तुमको स्वतः ही ज्ञात हो जाएगा I तुम्हें सही जगह पर जाना होगा, जहाँ लोग तुम्हारी कीमत जानें और सराहना करें, प्रोत्साहित करें

जय श्री राम

शुभरात्री

एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि उसके विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है।

एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि उसके विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है।

उस साधु ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने एक मित्र साधु के पास भेजा और उससे कहा, जाओ और उसकी समग्र जीवन-चर्या ध्यान से देखो। उससे ही तुम्हें मार्ग मिलने को है।
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वह व्यक्ति गया। जिस साधु के पास उसे भेजा गया था – वह सराय में रखवाला था।
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उसने वहां जाकर कुछ दिन तक उस साधू की दैनिकचर्या देखी। लेकिन, उसे उसमें कोई खास बात सीखने जैसी दिखाई नहीं पड़ी।
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वह साधु अत्यंत सामान्य और साधारण व्यक्ति था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं पड़ते थे।
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हां, बहुत सरल था और शिशुओं जैसा निर्दोष मालूम होता था, लेकिन उसकी चर्या में तो कुछ भी न था।
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फिर भी उस व्यक्ति ने साधु की पूरी दैनिकचर्या देखी थी कि केवल रात्रि में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद वह क्या करता था; वही भर उसे ज्ञात नहीं हुआ था।
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उसने उस साधू से ही उसकी दिनचर्या के बारे में पूछा।
साधु ने कहा, मेरी दिन मेरी दिनचर्या में कुछ भी नहीं। मैं रात्रि को सारे बर्तन मांजता हूं और चूंकि रात्रि भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुन: जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें फिर धोता हूं।
.मैं समझता हूँ कि –
बरतन गंदे और धूल भरे न हों, यह ध्यान रखना आवश्यक है। मैं इस सराय का रखवाला जो हूं।

उस व्यक्ति के समझ में कुछ भी नहीं आया और वह व्यक्ति इस साधु के पास से अत्यंत निराश होकर अपने गुरु के पास लौटा।
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उसने साधु की दैनिकचर्या और उससे हुई बातचीत गुरु को बताई।
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उसके गुरु ने कहा, जो जानने योग्य था, वह तुम सुन और देख आये हो। लेकिन समझ नहीं सके।
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उसने इशारे से ही तुमको बतला दिया कि –
रात्रि तुम भी अपने मन रुपी बर्तन को मांजो और सुबह उसे पुन: धो डालो। धीरे-धीरे तुम्हारा चित्त निर्मल हो जाएगा।

हमारा शरीर एक सराय ही तो है और हम उसके रखवाले। अतः चित्त की नित्य सफाई अत्यंत आवश्यक है। उसके स्वच्छ होने पर ही समग्र जीवन की स्वच्छता या अस्वच्छता निर्भर है।

इसलिय सदगुरु से ज्ञान प्राप्त भक्तों को प्रतिदिन भजन-अभ्यास करके अपने अन्तरमन को साफ़ रखना चाहिय!

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बेईमानी का पैसा शरीर के एक एक अंग फाड़कर निकलता है।

बेईमानी का पैसा शरीर के एक एक अंग फाड़कर निकलता है।

रमेश चंद्र शर्मा जो पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है और शायद उस पाप से,जिस में वह भागीदार बना, उससे भी बचा सकता है।
रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर जो कि अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था। लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।
रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं। वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। बूढ़े ने उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।
फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमत को जानता हूं। एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।
👉मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं,ईमानदारी से कमाएं । गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं है क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं,कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।
पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
जीवन शतरंज के खेल की तरह है और यह खेल आप ईश्वर के साथ खेल रहे हैं …
हमारी हर चाल के बाद अगली चाल ईश्वर चलता है।

जय श्रीराम

शुभरात्री

जीवन की मुस्कान

जीवन की मुस्कान

एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन दोंनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा- आपके लिए क्या लाना है?

उस व्यक्ति ने कहा- “मैंने मेरी बेटी को वादा किया था कि यदि तुम कक्षा दस में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हें शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा। इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ।” वेटर ने पूछा- “आपके लिए क्या लाना है?” उसने कहा- “मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।” पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा- “मैं इन दोनों को भर पेट नास्ता कराना चाहता हूँ। अभी मेरे पास पैसे नहीं है, इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलेरी से काट लेना।” मालिक ने कहा- “आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की पार्टी देंगे।”

होटल वालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहकों के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया। मालिक ने उन्हें एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना सम्मान पाकर आंखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए।

समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की I.A.S. की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई।उसने सबसे पहले उसी होटल में एक सिपाही भेज कर कहलाया कि कलेक्टर साहिबा नास्ता करने आयेंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया।यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया।

कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कुराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची। सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए। होटल के मालिक ने उन्हें गुलदस्ता भेंट किया और ऑर्डर के लिए निवेदन किया। उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस वेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- “शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं। मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिसाल पेश करते हुए मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी। आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ। आप दोनों का एहसान मैं सदैव याद रखूंगी। आज यह पार्टी मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी। कल आप दोनों को “” श्रेष्ठ नागरिक “” का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा।

💐💐शिक्षा-💐💐

किसी भी गरीब की गरीबी का मजाक बनाने के बजाय उसकी प्रतिभा का उचित सम्मान करें। संभव है आपके कारण कोई गुदड़ी का लाल अपनी मंजिल तक पहुंच जाए।

सदैव प्रसन्न रहिये
जो प्राप्त है,पर्याप्त है!!

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏

दो अनमोल हीरे

दो अनमोल हीरे

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा!

सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया!

घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया!

कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला!

नौकर चिल्लाया, “मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!”

सौदागर भी हैरान था! उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे!

सौदागर बोला: “मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!”

नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है!

बोला: “मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!”
लेकिन
सौदागर ने नौकर की एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी!

अपनी हीरों कि थैली पाकर ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था और बोला, “मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे! अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए!

सौदागर बोला, “मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!”

जितना सौदागर मना करता जा रहा था; ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था!

आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे!

इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया!

लेकी यह क्या! वह बड़ी पशोपेश में बोला, “मेरे सारे हीरे तो यही हैं तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?”

सौदागर बोला: वह दो हीरे है – “मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी!

सार्वभोमिक सत्य है कि आज भी जिन जिन के पास ये दो हीरे हैं – वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं!

🙏🏻🙏🙏🏿 सुप्रभात🙏🏾🙏🏽🙏🏼

माँ लक्ष्मी ने आगे कहा – जिस परिवार में गुरुजनों का सत्कार होता है; दुसरों के साथ जहाँ सभ्यता पूर्वक बात की जाती है और मुख से बोलकर कोई कलह नहीं करता मैं वहीं पर वास करती हूँ!

एक सेठ को स्वप्न में माँ लक्ष्मी ने दर्शन दिये और कहा – सेठ! अब तेरे पुण्य समाप्त हो गये हैं, इसलिए तेरे घर से कुछ ही दिनों में मैं चली जाऊँगी. तुझे मुझसे जो माँगना है, वह माँग ले!🌻

सेठ ने कहा- कल सुबह अपने कुटुम्ब के लोगों से विचार-विमर्श करके जो माँगना होगा – माँग लूँगा!🌷

सेठ ने सुबह स्वप्न की बात अपने परिवार के लोगों को बताई! परिवार के लोगों में से किसी ने वाहन माँगने को कहा तो किसी ने सोना-चाँदी तो किसी ने हीरे-मोती माँगने को कहा!

अन्त में सेठ की सबसे छोटी पुत्र-वधु बोली – पिता जी! जब लक्ष्मी को जाना ही है तो ये सब वस्तुएँ मिलने पर कहाँ रह पायेंगी?
आप इन्हें माँगेगे तो भी ये मिलेंगी नहीं! आप तो बस यही माँगिये कि परिवार में प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में परस्पर प्रेम बना रहेगा तो विपत्ति के दिन भी सरलता से कट जायेंगे!

सेठ को छोटी पुत्र-वधू की बात पसन्द आई! दूसरी रात्रि में स्वप्न में उन्हें फिर से माँ लक्ष्मी के दर्शन हुए!

सेठ ने प्रार्थना की – देवी! आप जाना चाहती हैं तो प्रसन्नता से जायें; किन्तु यह वरदान दें कि हमारे कुटुम्ब में परस्पर प्रेम बना रहे!

माँ लक्ष्मी बोलीं – सेठ! ऐसा वरदान माँग कर तुमने मुझे बाँध ही लिया है! जिस कुटुम्ब (परिवार) के सदस्यों में परस्पर प्रेम है, वहाँ से मैं कैसे जा सकती हूँ?

माँ लक्ष्मी ने आगे कहा – जिस परिवार में गुरुजनों का सत्कार होता है; दुसरों के साथ जहाँ सभ्यता पूर्वक बात की जाती है और मुख से बोलकर कोई कलह नहीं करता मैं वहीं पर वास करती हूँ!
🌷🌷🌹

मौन और अभिमान !

मौन और अभिमान !

एक राजा के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया। राजकुमार स्वभाव से ही कम बोलते थे। राजकुमार जब युवा हुआ तब भी अपनी उसी आदत के साथ मौन ही रहता था । राजा अपने राजकुमार की चुप्पी से परेशान रहते थे की आखिर ये बोलता क्यों नहीं है | राजा ने कई ज्योतिषियों, साधु-महात्माओं एवं चिकित्सकों को उन्हें दिखाया परन्तु कोई हल नहीं निकला। संतो ने कहा कि ऐसा लगता की पिछले जन्म में ये राजकुमार कोई साधु थे जिस वजह से इनके संस्कार इस जन्म में भी साधुओं के मौन व्रत जैसे हैं। राजा ऐसी बातों से संतुष्ट नहीं हुए।

एक दिन राजकुमार को राजा के मंत्री बगीचे में टहला रहे थे। उसी समय एक कौवा पेड़ कि डाल पे बैठ कर काव – काव करने लगा | मंत्री ने सोचा कि कौवे कि आवाज से राजकुमार परेशान होंगे इसलिए मंत्री ने कौवे को गोली मार दी | गोली लगते ही कौवा जमीन पर गिर गया। तब राजकुमार कौवे के पास जा कर बोले कि यदि तुम नहीं बोले होते तो नहीं मारे जाते। इतना सुन कर मंत्री बड़ा खुश हुआ कि राजकुमार आज बोले हैं और तत्काल ही राजा के पास ये खबर पहुंचा दी। राजा भी बहुत खुश हुआ और मंत्री को खूब ढेर – सारा उपहार दिया।

कई दिन बीत जाने के बाद भी राजकुमार चुप ही रहते थे। राजा को मंत्री कि बात पे संदेह हो गया और गुस्सा कर राजा ने मंत्री को फांसी पे लटकाने का हुक्म दिया। इतना सुन कर मंत्री दौड़ते हुए राज कुमार के पास आया और कहा कि उस दिन तो आप बोले थे परन्तु अब नहीं बोलते हैं। मैं तो कुछ देर में राजा के हुक्म से फांसी पे लटका दिया जाऊंगा |

मंत्री कि बात सुन कर राजकुमार बोले कि यदि तुम भी नहीं बोले होते तो आज तुम्हे भी फांसी का हुक्म नहीं होता। बोलना ही बंधन है। जब भी बोलो उचित और सत्य बोलो अन्यथा मौन रहो | जीवन में बहुत से विवाद का मुख्य कारण अत्यधिक बोलना ही है | एक चुप्पी हजारो कलह का नाश करती है |
कहा भी गया है कि –
जब जीवन में समझ बढ़ती है तो
इंसान मौन रहना पसंद करता है,
पर जब अभिमान बढ़ता है तो
इंसान अधिक बोलना पसंद करता है।
और
यह अभिमान और बडबोलापन ही था
जिसने
महाज्ञानी रावण का सर्वनाश कर डाला!

🌹🌹🙏आपको दशहरा पर्व की हार्दिक शुभ कामनाएं🙏🌹🌹*

बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए।

बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए। *

समस्त अंतापुर रो पड़ा अपने राजकुमार की याद में!ऐसा कोई प्रजाजन नहीं था जिसने सुकर्णव की अर्थी देख आँसू ना बहाए हों।

दाह संस्कार संपन्न हुआ। पुत्र शोक अब प्रतिशोध की ज्वाला में भड़क उठा और महाराज वेनुविकर्ण ने कारागृह से बंदी बहेलिया को उपस्थित करने का आदेश दिया।

बहेलिया लाया गया। महाराज ने तड़पते हुए पूछा – दुष्ट बहेलियां! तूने राजकुमार का वध किया है, बोल तुझे मृत्युदंड क्यों न दिया जाए?

बहेलिया ने एक बार सभा भवन में बैठे हर व्यक्ति पर दृष्टि दौड़ाई। फिर राजपुरोहित पर एक क्षण को उसकी दृष्टि ठहर गई। उसे कुछ याद आया!

बहेलिए ने कहा – “महाराज मेरा इसमें क्या दोष?  मृत्यु ने राजकुमार को मारने का निश्चय किया था! मुझे माध्यम बनाया! मेरी बुद्धि भ्रमित की और मैंने राजकुमार को कस्तूरी मृग समझकर तीर छोड़ दिया! जो दंड आप मुझे देना चाहते हैं – वही मृत्यु को दें। चाहे तो राजपुरोहित से पूछ ले!

यह भी तो कहते हैं कि विधाता ने जितनी आयु लिख दी – उसे कोई घटा या बढ़ा नहीं सकता। घटनाएं तो मृत्यु के लिए मात्र माध्यम होती हैं।”

विकर्ण का क्रोध विस्मय में बदल गया। उन्होंने राजपुरोहित की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि सचमुच वे भी बहेलिया का मूक समर्थन कर रहे हैं।

उन्होंने मृत्यु का आव्हान किया! मृत्यु उपस्थित हुई । महाराज ने उससे पूछा- “आपने राजकुमार को मारने का विधान क्यों रचा?”
“उनका काल आ गया था! मृत्यु बोली।”

तो फिर काल को बुलाया गया।

काल ने कहा,- “मैं क्या कर सकता था – महामहिम *!!
यह तो राजकुमार के कर्मों का दोष था। कर्मफल से कोई बच नहीं सकता। राजकुमार ही उसके अपवाद कैसे हो सकते थे ?”

कर्म की पुकार की गई।

उसने उपस्थित होकर कहा – “आर्य श्रेष्ठ!अच्छा हूँ या बुरा – मैं तो जड़ हूं। मुझे तो आत्म चेतना चलाती है! उसकी इच्छा ही मेरा अस्तित्व है। आप राजकुमार की आत्मा को ही बुला कर पूछ लें! उन्होंने मुझे क्रियान्वित ही क्यों किया? “

और अंत में राजकुमार की आत्मा बुलाई गई।

दंड नायक ने प्रश्न किया- भन्ते! जब तुम कर्ता की स्थिति में थे! क्या यह सच है कि तुमने कोई ऐसा कार्य किया- जिसके फलस्वरूप तुम्हें अकाल, काल-कबलित होना पड़ा?

शरीर के बंधन से मुक्त, आकाश में स्थिर, राजकुमार की आत्मा थोड़ा मुस्कुराई ! फिर गंभीर होकर बोली -“राजन! पूर्व जन्म में, मैंने इसी स्थान पर मांस भक्षण की इच्छा से एक मृग का वध किया था। मृग में मरते समय प्रतिशोध का भाव था! उसी भाव ने बहेलिया को भ्रमित किया! इसीलिए बहेलिये का कोई दोष नहीं, ना मुझे काल ने मारा है। 🕉️मनुष्य के कर्म ही उसे मारते और जलाते हैं,🕉️ इसीलिए तुम मेरी चिंता छोडो़, कर्म की गति बड़ी गहन है। अपने कर्मों का हिसाब करो।भावी जीवन की प्रगति और उससे स्वर्ग मुक्ति, सब कर्म की गति पर ही आधारित है। सो तात!  तुम भी अपने कर्म सुधारो।
इसीलिय कहा गया है कि –
कर्म प्रधान विश्व रची रखा!
जो जस करहीं सो तस फल चाखा!!
🙏🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏

संगत का असर

संगत का असर

एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला! थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था! तो डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी!

वहीं से एक अति सुन्दर हंस उड़कर जा रहा था! उस हंस ने देखा कि वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें।

जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, * इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया।

तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था! मैं तो आपको छाँव दे रहा था और आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष?

तब समय उस शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ हो आपकी सोच भी आपके तन की तरह ही सुंदर हैं! आपके संस्कार शुद्ध हैं! यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे लेकिन आपसे एक गलती हो गयी कि जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था।

उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया हैं ।

संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, बुद्धि और कार्य से परमहंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये!
कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है।
व्यक्ति को जीवन के अंतिम क्षणों में गति भी उसकी संगति के अनुसार ही मिलती है। संगति का जीवन में बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। संगति से मनुष्य जहां महान बनता है, वहीं बुरी संगति उसका पतन भी करती है।

छत्रपति शिवाजी बहादुर बने। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी मां ने उन्हें वैसा वातावरण दिया।
नेपोलियन जीवन भर बिल्ली से डरते रहे, क्योंकि बचपन में बिल्ली ने उन्हें डरा दिया था।
माता-पिता के साथ-साथ बच्चे पर स्कूली शिक्षा का गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार व्यक्ति पढ़ाई-लिखाई करके उच्च पदों पर पहुंच तो जाता है, लेकिन संस्कारों के अभाव में, सही संगति न मिलने के कारण वह हिटलर जैसा तानाशाह बन जाता है।
सदाचरण के पालन से चाहे तो व्यक्ति ऐसा बहुत कुछ कर सकता है, जिससे उसका जीवन सार्थक हो सके, परंतु सदाचरण का पालन न करने से वह अंतत: खोखला हो जाता है।

हो सकता है कि चोरी-बेईमानी आदि करके वह धन कमा ले, कुछ समय के लिए पद-प्रतिष्ठा अर्जित कर ले, लेकिन उसका अंत बुरा ही होता है।
सत्संगति का, अच्छे विचारों का बीज बच्चे के मन में बचपन में ही बो देना चाहिए।
व्यक्ति की अच्छी संगति से उसके स्वयं का परिवार तो अच्छा होता ही है, साथ ही उसका प्रभाव समाज व राष्ट्र पर भी गहरा पड़ता है।

जहां अच्छी संगति व्यक्ति को कुछ नया करते रहने की समय-समय पर प्रेरणा देती है, वहीं बुरी संगति से व्यक्ति गहरे अंधकूप में गिर जाता है।

अच्छी संगति व्यक्ति का मन व चित्त निर्मल करती है। उसकी प्रसन्नता बनी रहती है। दिन-प्रतिदिन उसके व्यक्तित्व में निखार आता है।
संगति कैसी है, इस बात से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है। जीवन का हर कदम मायने रखता है।

इसलिए उसे फूंक-फूंककर आगे बढ़ना चाहिए।

अक्सर ऐसा देखने में आता है कि कुछ बच्चे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन बुरी संगति में फंसकर नशा या मद्यपान करने लगते हैं। उनका जीवन बर्बाद हो जाता है। वे झूठी चकाचौंध में फंसकर स्वयं की वास्तविक शक्ति को नहीं पहचानते हैं। कई बार सत्संगति न मिलने के कारण उपयुक्त वातावरण न होने के चलते बच्चा अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाता, जबकि सत्संगति से उसमें अटूट विश्वास जगता है और वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏🏼