बदलाव – अपने में

बदलाव – अपने में

बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?”

“कुछ नहीं , बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था!”, दादा जी बोले ।

“जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न …” बच्चों ने ज़िद्द् की।

दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थ , मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी, मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था!

जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ – बुद्धि कुछ बढ़ी तो सोचने लगा कि ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है!
इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया! सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ!

पर जब कुछ और समय बीता- मैं अधेड़ होने को आया तो लगा कि ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है! हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है! चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ!

पर अफ़सोस कि मैं वो भी नहीं कर पाया !

और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता और हो सकता है मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता!

ये कहते-कहते दादा जी की आँखें नम हो गयीं और वे धीरे से बोले, “बच्चों ! तुम मेरी जैसी गलती मत करना! कुछ और बदलने से पहले खुद को बदलना बाकि सब अपने आप बदलता चला जायेगा!

सचमुच में, हम सभी में दुनिया बदलने की ताकत है पर इसकी शुरआत खुद से ही करनी होती है! कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा! हमें खुद को तैयार करना होगा! अपने कौशल को मजबूत करना होगा! अपने attitude को सकारात्मक बनाना होगा! अपने लक्ष्य को फौलाद करना होगा और तभी हम वो हर एक बदलाव ला पाएंगे जो हम सचमुच लाना चाहते हैं।
प्रेम रावत भी यही कहते हैं कि जब हर एक आदमी शांति का अनुबह्व करने लगेगा तो विश्व शांति स्वत हो जाएगी!
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माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की और कहा, भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।

लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी! भयंकर गङ्ढ था!

मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’

हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी पर उसने कुछ ध्यान न दिया।

फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘*हमारी यात्रा बड़ी सुखद हुई! साथी-संगी रहे, मित्रता बनी! अब मैं जाती हूं! कोई काम हो तो मुझे कहना!

तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी! उसने कहा, ‘तू कौन है – कुछ पता नहीं! कब तू आयी! कब तू मेरे शरीर पर बैठी! कब तू उड़ गयी – इसका भी मुझे कोई पता नहीं है।

लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी…

सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है तो हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन हम भी मक्खी कि तरह बड़ा शोरगुल मचाते हैं।
सोचने की बात है कि वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी?
वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, तू भी है! तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहती थी।

हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता! दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है।

इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि
किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें! हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।

हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये!
स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें!
धन इकट्ठा करते, मकान बनाते तो दूसरों को दिखाने के लिये
दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण।
हकीकत यही है कि-
हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे!
हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं!
वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं।

हमारा अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि उसे वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

इसलिय; याद रखना चाहिए कि आ*त्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा!
इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर जब तक जीवन है
सदभावना पूर्वक जीना चाहिए!
और
सबका सम्मान करना चाहिए!
क्योंकि
जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा  हैं।
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खुद का सुधार

खुद का सुधार

एक व्यक्ति अपने परिवार, रिश्तेदार, मित्र, मोहल्ला के निवासी, अपनी फैक्ट्री के कार्यकर्ताओं से अति दुःखी होकर समाधान हेतु अपने गुरु के पास पहुंचा और अपनी पीड़ा गुरुदेव को बताते हुए बोला- “मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेर आसपास के सभी लोग बेहद स्वार्थी हैं। कोई भी सही नहीं है, क्या करूं गुरुदेव?”

उस व्यक्ति की वेदना को समझ गुरुजी उसकी समस्या को भली-भांति समझ गए।मुस्कान के साथ उन्होंने कहा- “पुत्र, नि:संदेह तुम्हारी समस्या अति गंभीर है। समय रहते इसका समाधान आवश्यक है। तुम आज रात आश्रम में ही रहो। मैं रात्रि में मंथन करूंगा और सुबह समाधान बताऊंगा।”

उस व्यक्ति को अपने गुरु पर अटूट विश्वास था। उसने आश्रम में रात्रि विश्राम की बात स्वीकार ली और आश्रम के निवासियों के पास जा पहुंचा। भोर की पूजा-अर्चना के पश्चात अपने अन्य शिष्यों की समस्याओं को निबटा कर गुरुजी ने अंत में उस व्यक्ति को अपने पास बुलाया।
एक रात आश्रम में बिताने के अनुभव को भी वह व्यक्ति अपने गुरु को बताने से स्वय को रोक न सका और बोला- “गुरुदेव, आपके आश्रम में भी स्वार्थियों ने अपना डेरा जमा रखा है।हर कोई आपसे कुछ न कुछ चाहकर ही यहां रुका है।”

गुरुदेव ने उसकी हर बात को गंभीरता से सुना और अंत में कहा- “मैं एक कहानी सुना रहा हूं, उसे गंभीरता से सुनना। इस कहानी में ही तुम्हारी समस्या का समाधान छिपा है।

एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 1 हजार आईने लगे थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 1 हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं और वो उन बच्चों के प्रतिबिंब के रहकर खुश रहने लगी। जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते। उसने सोचा यह दुनियां की सबसे अच्छी जगह है और यहां वह बार बार आना चाहेगी।

बच्ची के प्रस्थान के पश्चात थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया। उसने अपने चारों तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है ।उसने कहा यह दुनियां की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी ।

ठीक इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे हैं।
जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है।
संसार हमें अपने मन के अनुरूप ही दिखता है
इसलिए
अपने मन और दिल को साफ़ रखें,
यक़ीनन तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग की तरह अनुभव होगी।
संसार को सुधारने की आकांक्षा रखने वालों के लिए
सर्वप्रथम आवश्यक है कि हम स्वयं में सुधार करें, संसार अपने आप सुधर जाएगा।
यही बात महाराजी भी कहते हैं कि
संसार को शांति नहीं चाहिय
अगर
हर एक व्यक्ति को शान्त होना होगा
तो
संसार में शांति स्वत: हो जाएगी!
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अपना-अपना भाग्य

अपना-अपना भाग्य

एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया। मालिक ने सोचा इसकी तन्खाह बढ़ा दी जाये तो यह और लगन से काम करेगा और उसकी तन्खाह बढ़ा दी।

अगली बार जब उसको तन्खाह से अधिक पैसे दिये, तो वह कुछ नहीं बोला चुपचाप पैसे रख लिये। कुछ महीनों बाद वह फिर अनुपस्थित हो गया। मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया, सोचा इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ, यह नहीं सुधरेगा और उसने बढ़ी हुई तन्खाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही तन्खाह दी। वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और कुछ ना बोला। मालिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने उससे पूछा कि जब मैंने तुम्हारे अनुपस्थित होने के बाद तुम्हारी तन्खाह बढ़ा कर दी तुम कुछ नहीं बोले और आज तुम्हारी अनुपस्थिति पर तन्खाह कम कर के दी फिर भी शान्त ही हो, इसकी क्या वजह है ?

उसने जवाब दिया, जब मैं पहले अनुपस्थित हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। आपने मेरी तन्खाह बढ़ा कर दी तो मैं समझ गया, परमात्मा ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेज दिया है और जब दोबारा मैं अनुपस्थित हुआ तो मेरी माता जी
का निधन हो गया था। जब आप ने मेरी तन्खाह कम दी तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का उनके साथ ही चला गया। अब मैं उस तनख्वाह के लिये क्यों चिन्तित होऊँ जिसका हिसाब स्वयं परमात्मा ने ले रखा है।

बहुत ही मजबूत रिश्ता है मेरे और भगवान के बीच में, ज्यादा मैं माँगता नहीं और कम वो देता नहीं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

शहर जयपुर में बसे मालवीय नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌ ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क  में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था – मैं भोपाल में इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो दिल्ली में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया – आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।

लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं है‌ कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌। हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मीणा साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो बैरवा.. जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब – करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं‌ करता‌। कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे‌ नेम प्लेट लगाते‌ हैं – रिटायर्ड आइएएस‌/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज‌ आदि – आदि। अब ये‌ रिटायर्ड IAS/IPS/PCS/तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/ अध्यापक और न जाने कौन-कौन सी पोस्ट होती है भाई?माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या? अब यह बात मायने नहीं रखती है। बल्कि मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे, आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी, समाज को क्या दिया, मित्र बन्धुओं के कितने काम आएं, समाज के  कितने लोगों की मदद की या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे? पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है।

शिक्षा

यह पोस्ट उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अभी भी वक्त है इस पोस्ट को पढ़िए, चिंतन करिए तथा समाज का यथासंभव हित कीजिए। अपने पद रूपी बल्ब से समाज व देश को रोशन करिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

एक गाँव में यज्ञ हो रहा था और गाँव का राजा एक बकरे की बलि चढ़ा रहा था।

भगवान बुद्ध गाँव से गुज़र रहे थे तो वो वहाँ पहुँच गए और उन्होंने उस राजा को कहा कि, “ये क्या कर रहे हो? इस बकरे को किसलिए चढ़ा रहे हो?”

तो राजा ने कहा कि, “इसके चढ़ाने से बड़ा पुण्य होता है।”

तब बुद्ध ने कहा, “मुझे चढ़ा दो, तो और भी ज़्यादा पुण्य होगा।”

राजा थोड़ा डरा और विचारशुन्य होकर मन ही मन सोचने लगा कि बकरे को चढ़ाने में कोई हर्ज़ा नहीं है लेकिन बुद्ध को चढ़ाना! उसके भी हाथ-पैर कांपने लगे!

भगवान बुद्ध ने कहा कि, “अगर सच में ही कोई लाभ करना हो तो अपने आप को चढ़ा दो। बकरा चढ़ाने से क्या होगा?”

उस राजा ने कहा, “इस बकरे का कोई नुकसान नहीं है, स्वर्ग चला जाएगा।”

बुद्ध ने कहा, “ये बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की ही तलाश कर रहा हूँ, तुम मुझे चढ़ा दो। तुम मुझे स्वर्ग भेज दो और तुम अपने माता-पिता को क्यों नहीं भेजते स्वर्ग और ख़ुद को क्यों रोके हुए हो?

जब तुमको स्वर्ग जाने की ऐसी सरल और सुगम तरकीब मिल ही गई है तो काट लो गर्दन।
बकरे को बेचारे को क्यों भेज रहे हो? जो शायद जाना भी न चाहता हो स्वर्ग!

बकरे को ख़ुद ही चुनने दो कि कहाँ उसे जाना है।”

राजा को बात समझ में आयी क्योंकि भगवान बुद्ध ने सहजता से कटु सत्य कहा था!

उन्होंने आगे कहा कि तुमने परमात्मा को सब चढ़ाया है- धन चढ़ाया, फूल चढ़ाए। जबकि फूल भी तुम्हारे नहीं… वो भी परमात्मा के हैं! वृक्षों पर पहले से चढ़े ही हुए थे।

उन फूलों का वृक्षों पर सजीव रूप में खिलना, सुगंध देना क्या परमात्मा के चरणों में चढ़ना नहीं था?

वृक्षों के ऊपर से उनकी परमात्मा की यात्रा हो ही रही थी। वहीं तो जा रही थी वह सुगन्ध और कहाँ जाती?

तुमने उनको वृक्षों से तोड़ के उन फूलों को मुर्दाकर लिया और फिर मुर्दा फूलों को जाकर मन्दिर में चढ़ा आए और समझने लगे कि बड़ा काम कर आए हो!

कभी धूप-दीप जलाए तो कभी जानवर चढ़ाए तो कभी आदमी भी चढ़ा दिए!

अपने को कब चढ़ाओगे?

और सत्य यही है कि जो अपने को चढ़ाता है, खुद को पूर्ण रूप से समर्पित करता है – वही उस परमात्मा को पाता है।

इसलिए, अगर जीते जी स्वर्ग का अनुभव करना चाहते हो, भगवान के लिए कुछ करना चाहते हो, उनको प्रसन्न करना चाहते हो तो *खुद को ही भेंट स्वरूप चढ़ाओ – तभी उनसे भेट होगी! खुद को समर्पित किये बिना कुछ भी नहीं हो सकता!
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एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक दिन उड़ते हुए वह एक सरोवर के किनारे पहुँचा! वहाँ उसने एक उजले सफ़ेद हंस को तैरते हुए देखा।

उसे देखकर वह सोचने लगा – “यह हंस कितना सौभाग्यशाली है, जो इतना सफेद और सुन्दर है। इधर मुझे देखो, मैं कितना काला और बदसूरत हूँ।ये हंस अवश्य इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा!”

वह हंस के पास गया और अपने मन की बात उसे बता दी। सुनकर हंस बोला, “नहीं मित्र! वास्तव में ऐसा नहीं है।

पहले मैं भी सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का सबसे सुन्दर पक्षी हूँ. इसलिए बहुत सुखी और खुश था लेकिन एक दिन मैंने तोते को देखा; जिसके पास दो रंगों की अनोखी छटा है!

उसके बाद से मुझे यकीन हुआ कि वही दुनिया का सबसे सुन्दर और खुश पक्षी है”

हंस की बात सुनने के बाद कौवा तोते के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह दुनिया का सबसे खुश पक्षी है?

तोते ने उत्तर दिया, “मैं बहुत ही खुशगवार जीवन व्यतीत कर रहा था! लेकिन जब मैंने मोर को देखा था तो अब मुझे लगता है कि मोर से सुन्दर तो कोई हो ही नहीं सकता। इसलिये मेरी समझ से वही दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी है।

इसके बाद कौवा मोर की खोज में निकला उड़ते-उड़ते वह एक चिड़ियाघर पहुँचा! वहाँ उसने देखा कि *मोर एक पिन्जरे में बन्द है और उसे देखने के लिए बहुत सारे लोग जमा हैं और सभी मोर की बहुत सराहना कर रहे थे!

सबके जाने के बाद कौवा मोर के पास गया और उससे बोला, “तुम कितने सौभाग्यशाली हो, जो तुम्हारी सुन्दरता के कारण हर रोज़ हजारों लोग तुम्हें देखने आते हैं! मुझे तो लोग अपने आस-पास भी फटकने नहीं देते और देखते ही भगा देते हैं! तुम इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो ना?”

कौवे की बात सुनकर मोर उदास हो गया।

वह बोला, “मित्र! मुझे भी अपनी सुन्दरता पर बड़ा गुमान था।

मैं सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का क्या, बल्कि इस पूरे ब्रम्हाण्ड का सबसे सुन्दर पक्षी हूंँ। इसलिए खुश भी बहुत था। लेकिन मेरी यही सुन्दरता मेरी शत्रु बन गई है और मैं इस चिड़ियाघर में बन्द हूंँ।

यहांँ आने के बाद इस पूरे चिड़ियाघर का अच्छी तरह मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंँचा हूंँ कि कौवा ही एक ऐसा पक्षी है जो यहांँ कैद नहीं है।

इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं सोचने लगा हूंँ कि काश मैं कौवा होता तो कम से कम आजादी से बाहर घूम सकता और तब मैं इस दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी होता।

हम भी अपने जीवन में हमेशा दूसरों को देखकर स्वयंँ की तुलना व्यर्थ ही उनसे करने लगते हैं और दुखी हो जाते हैं! भगवान ने सब को अलग बनाया है और अलग गुण दिए हैं! हम उसका महत्व नहीं समझते और अपनी ही तुलनात्मक दृष्टि के कारण दुख के चक्र में फंँस जाते हैं। इसलिए दूसरों के पास जो है उसे देखकर ईर्ष्या करने की बजाय यह सोचने के कि हमें हमारे पास जो भी है उसके साथ खुश रहना सीखना चाहिए; खुशी बाहर ढूंढने से नहीं मिलती, वह तो हमारी अन्दर ही छिपी हुई है।

इस ईर्ष्या का त्याग केवल मात्र भजन सुमिरणसे ही हो सम्भव है इसलिए हमें श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा में रहकर भजन सुमिरण करना चाहिए। अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

सुमति

सुमति

एक बार किसी ने तुलसी दास जी से पूछा — महाराज ! सम्पूर्ण रामायण का सार क्या है ?
क्या कोई चौपाई ऐसी है जिसे हम सम्पूर्ण रामायण का सार कह सकते हैं ? तुलसी दास जी ने कहा -हाँ है, और वह है।

जहां सुमति तह सम्पत्ति नाना
जहां कुमति तहँ विपत्ति आना

जहां सुमति होती है, वहां हर प्रकार की सम्पत्ति, सुख-सुविधाएं होती है!
और जहां कुमति होती है, वहां विपत्ति, दुःख और कष्ट पीछा नहीं छोड़ते।

सुमति थी अयोध्या में – भाई-भाई में प्रेम था, पिता और पुत्र में प्रेम था, राजा-प्रजा में प्रेम था, सास-बहू में प्रेम था और मालिक-सेवक में प्रेम था, तो उजड़ी हुई अयोध्या फिर से बस गई।

कुमति थी लंका में तो – एक भाई ने दूसरे भाई को लात मारकर निकाल दिया। कुमति और अनीति के कारण सोने की लंका राख का ढेर हो गई।

गुरु वाणी में आता है।
इक लख पूत सवा लख नाती
ता रावण घर दीया ना बाती

पाँच पाण्डवों में सुमति थी तो उन पर कितनी विपदाएं आई, लेकिन अंत में विजय उनकी ही हुई और हस्तिनापुर में उनका राज्य हुआ।
कौरवों में कुमति थी अनीति थी, अनाचार था, अधर्म था, तो उनकी पराजय हुई और सारे भाई मारे गए।

यदि जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो जीवन में सुमति अपनाओ।

कैकयी को दण्ड

कैकयी को दण्ड

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों के संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा -एक बात पूछूँ, भइया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था – क्या वह राजद्रोह नहीं था?
उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा और दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई! ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए! बोले ~ जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले, तो उसका जीवन उसके असंख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है! जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो, उसे भला दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?

भरत संतुष्ट नहीं हुए और कहा ~ यह तो मोह है भइया और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है! एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया?

यही समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं बल्कि अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है!

राम गम्भीर हो गए! कुछ क्षण के मौन के बाद कहा ~ अपने सगे-सम्बन्धियों को किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत!

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है! वनवास के चौदह वर्षों में – हम चारों भाई अपने-अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं पर माता कैकई? हर क्षण मरती रही हैं! अपनी एक भूल के कारण! उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं! वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं! कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

उन्होंने आगे समझाया कि मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा!

राम के अश्रुपूरित नेत्रों को देख भरत आदि भाई मौन हो गए थे!

राम ने फिर कहा ~ भरत भाई, उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों? यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता? मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा! वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है?

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे! वे अनायास ही बड़े भाई राम के चरणों में नतमस्तक हो गये!
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बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

   वैसे तो साथियों जीवन का नाम ही समस्या है अर्थात जिस जीवन में समस्या नहीं है वह जीवन किसी काम का नहीं होता समस्याएं जीवन का एक अभिन्न अंग है जीवन में आती रहती है जाती रहती लेकिन यदि आपके जीवन इस तरह की आकस्मिक घटना या समस्या आ जाये जो सोची भी ना जा सकती हो और ना जिसका कोई हल हो तो उसे क्या कहोगे . आपने एक कहावत सुनी  होगी जब आदमी का वक्त खराब होता है तो ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट लेता है .  शायद कहावत के शब्दो को आप जान गये परन्तु कहावत के असली मर्म को नही जाने कि आखिर कुत्ता इतने उँचे ऊँट पर बैठे आदमी को कैसे काट सकता है .
आईये मै बताता हू . कुत्ता कैसे काटता है . दोनो सच्ची घटना है . एक भारत की है और एक अमेरिका की .
1978 की बात हे दिल्ली की सड़को  एक भाई साहब जून की भरी दोपहरी मे स्कूटर पर कही जा रहे थे . गर्मी के कारण हेलमेट से  सिर पर पसीना था . सामने रेड लाईट थी . रुक गये . सडक के किनारे पेड था जिसकी छाव सडक पर आ रही थी . भाई साहब ने हेलमेट उतारा ताकी छाँव और हवा से पसीने मे कुछ राहत मिले . उसी समय आसमान मे एक चील अपनी चोच मे जहरीले सांप को लिये जा रही थी . अचानक सांप की हिलने डुलने की कोशिश से चील की चोच ढीली हो गई .सांप छूट कर नीचे गिरा . 

कहाँ गिरा ? आदमी की खोपडी पर जिसने अभी अभी गर्मी से बचने के लिये हेलमेट उतारा था . सांप खोपडी पर गिरा और गिरते ही आत्मरक्षा के भाव से भाई को डस लिया . पब्लिक जब तक कुछ समझती तब तक भाई साहब रेड लाईट पर ही रेड हो गये . चलते चलते हमेशा के लिये ग्रीन लाईट रेड हो गई .
नही नही विश्वास करो ये काल्पनिक नही सच्ची घटना है .
दूसरी घटना इससे भी दिलचस्प है . अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के एक जंगल मे आग लगी . फौरन फायर बिग्रेड चेतन हुई . आग पर काबू पाने के लिये पानी से भरे अपने हैलीकाप्टर भेजे . पानी बरसाकर आग तो शान्त हो गई . पर पुलिस जंगल मे देखने गई कि कही नुक्सान ज्यादा तो नही हो गया . वहाँ जंगल मे उन्होने देखा एक व्यक्ति आग से भूना पडा है . उसने स्विमिंग सूट पहन रखा है . पुलिस बडे असमंजस मे कि ये आदमी स्विमिंग सूट मे यहाॅ क्या कर रहा था . जंगल मे कोई तालाब या स्विमिंग पूल भी नही था कि नहाने आया हो . फिर ये कैसे सम्भव है ? पुलिस हैरान कि ये व्यक्ति स्विमिंग सूट पहनकर जंगल मे करने क्या आया था ?
भारत होता तो कोई परवाह नही करता ना कोई सोचता . मर गया तो मर गया आग तो बुझ गई . परन्तु अमेरिकी पुलिस ने जांच बैठा दी और पता लगाने की कोशिश की ये व्यक्ति था कौन और स्विमिंग सूट मे सूनसान जंगल मे करने क्या आया था ? जो एक असम्भव बात थी .
जाच की रिसर्च से पता चला जब हैलीकाप्टर उपर उडकर पानी बरसा रहे थे तो कुछ हैलीकोप्टर जिनका पानी खत्म हो गया था पानी लेने के लिये जंगल से थोड़ी दूर एक स्विमिंग पूल मे पानी भरने गये . वहाँ उन्हे ये व्यक्ति दिखाई ही नही दिया . पानी भरने की जल्दबाजी मे पायलट ध्यान ही नही पाया या हो सकता है भाई साहब ने शैखी बघारने के लिये डुबकी लगाई हो कि देखो मै कितनी बडी डुबकी लगाता हू . तभी हैलीकोप्टर ने पानी खिचना शुरू किया . हैलीकोप्टर का पम्प बहुत मजबूत था . शक्तिशाली था . जब पानी खीचा तो भाई साहब ने डुबकी लगाई और पम्प ने भाई साहब को पानी के साथ खींच लिया . भाई साहब सोच रहे थे कि अरे ये क्या हुआ डुबकी पानी मे लगाई और मै आसमान मे उड रहा हू . ये कैसे हो गया ? जब तक समझ पाते हैलीकोप्टर ने सारा पानी जंगल मे बिखरा गया . भाई साहब भी पानी के साथ जंगल की आग मे फेंक दिये गये और आग मे भून गये .
कोई काल्पनिक कहानी नही सच्ची घटना है . ये कहानी डिस्कवरी पर मैंने खुद देखी है .
बिलकुल सच्ची घटना है दोनो .
अब आप बताईये दोनो भाई साहब अपने आप को सुरक्षित समझ रहे थे मगर हुआ क्या ? उन्होंने इसकी कल्पना भी नही की होगी .
इसे ही कहते है बुरा वक्त जब आता है ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता खाट खाता है .
वैसे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ते ने कैसे काटा ये अलग कहानी है जो कहावत बन गई . वैसे बता दू कुत्ते ने सममुच ही ऊँट पर बैठे आदमी को काटा था . पर कैसे ? ये अलग तरह की अजब कहानी है . फिर कभी बताऊंगा .
तब तक आप इसी तरह की अन्प कहानी ध्यान मे लाते रहो . मुझे बताना भी .
🙂
🙏🏻 जय भारत 🇮🇳