जैसा अन्न वैसा मन

*🍁जैसा अन्न वैसा मन 🍁*

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी !

अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ?

तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?

भगवन ने जहा कि चलो गंगा से ही पूछते है, दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि “हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई !”

गंगा ने कहा “मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ !”

अब वे लोग समुद्र के पास गए, “हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए !”
समुद्र ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ !”

अब वे लोग बादल के पास गए और कहा “हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप

बादलों ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में *जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है, जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है , उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है !”*

*अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसे ही विचार मानव के बन जाते है ! इसीलिये सदैव भोजन सिमरन और शांत अवस्था मे करना चाहिए और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए !*
जैसे-
भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे। द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।

इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी। श्रीकृष्ण ने भांप लिया था। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए. परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है।

इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए। पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे। द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी. अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई।

भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूं। द्रोपदी सकुचाई को भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो. मुझे शांति मिलेगी।

द्रोपदी ने कहा- स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?

भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। जैसा अन्न वैसा मन। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था। उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी। सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी।

*अन्न ही रक्त का कारक है। अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है। अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है। सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं।*

*भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए। दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है। उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है। यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है। जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे।*

*आपका दिन मंगलमय हो*

कड़वा वचन

*कड़वा वचन*

सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे। उनमें हर गुण था- नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण। जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे। आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे। खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते।

किंतु, यह सब कब तक चलता। वे पुन: उनसे बोलने लगते। इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली। उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया।

अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले- “महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये।” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा- “सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना।”

“ठीक है, महाराज” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये। घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा। किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे। अतः वे साधु के पास नहीं आये। तब एक दिन साधु महाराज स्वयं ही उनके घर पहुंच गये। वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे।

साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी। परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे।

साधु महाराज सेठ जी से बोले- “सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये।” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये। उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा।

ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया और साधु से बोले- “यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?”

“अरे आपकी जबान जानती है कि कड़वा क्या होता है” साधु महाराज ने कहा। “यह तो हर कोई जानता है” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा।

“नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता। सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले। सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है।”

सेठ समझ गये थे कि साधु ने जो कुछ कहा है उन्हें ही लक्षित करके कहा है। वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े- “बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा।”

सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसन्नता से भर उठे। तभी सेठ जी ने साधु से पूछा- “किंतु, महाराज ! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है ?”

साधु मुस्कुराकर बोले- “ नीम के पत्तों का अर्क।” “क्या” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये।

*शिक्षा:-*

*मित्रों! कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं। किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है। परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है..!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

*🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏*

अनुशासन 

*” अनुशासन “*

जीवन का एक सीधा सा नियम है और वो ये कि *अगर अनुशासन नहीं तो प्रगति भी नहीं।।*

अनुशासन में बहकर ही एक नदी सागर तक पहुँचकर सागर ही बन जाती है।
अनुशासन में बँधकर ही एक बेल जमीन से उठकर वृक्ष जैसी ऊँचाई को प्राप्त कर पाती है
और अनुशासन में रहकर ही वायु फूलों की खुशबु को अपने में समेटकर स्वयं भी सुगंधित हो जाती है और चारों दिशाओं को सुगंध से भर देती है।

पानी अनुशासन हीन होता है तो बाढ़ का रूप धारण कर लेता है!
हवा अनुशासन हीन होती है तो आँधी बन जाती है!
अग्नि अगर अनुशासन हीन हो जाती है तो महा विनाश का कारण बन जाती है।
*ऐसे ही अनुशासनहीनता स्वयं के जीवन को तो विनाश की तरफ ले ही जाती है साथ ही साथ दूसरों के लिए भी विनाश का कारण बन जाती है।।*

गाड़ी अनुशासन में चले तो सफर का आनंद और बढ़ जाता है। *इसी प्रकार जीवन भी अनुशासन में चले तो जीवन यात्रा का आनंद और बढ़ जाता है। जीवन का घोड़ा निरंकुशता अथवा उच्छृंखलता का त्याग करके निरंतर प्रगति पथ पर अथवा तो अपने लक्ष्य की ओर दौड़ता रहे उसके लिए अपने हाथों में अनुशासन रुपी लगाम का होना भी परमावश्यक हो जाता है..!!*
*अनुशासन में रहकर कर्म करने से जीवन में बहुत कुछ पा सकते हैं!*

*सोई सेवक प्रियतम मम सोई!
*मम अनुशासन माने जोई!!*
🌸🌸🌸🌸
*🙏🏿🙏🙏🏾 *सुप्रभात*🙏🏻🙏🏼🙏🏽

सच्ची सद्गति कैसे….?

💫सच्ची सद्गति कैसे….?🌷

✍️ …..एक व्यापारी अपने ग्राहक को शहद दे रहा था। अचानक व्यापारी के हाथ से छूटकर शहद का बर्तन गिर पड़ा। बहुत-सा शहद भूमि पर ढुलक गया। जितना शहद व्यापारी उठा सकता था, उतना उसने ऊपर-ऊपर से उठा लिया; लेकिन कुछ शहद भूमि में गिरा रह गया।

बहुत-सी मखियाँ शहद की मिठास के लोभ से आकर उस शहद पर बैठ गयीं। मीठा-मीठा शहद उन्हें बहुत अच्छा लगा। जल्दी-जल्दी वे उसे चाटने लगीं। जब तक उनका पेट भर नही गया, वे शहद चाटने में लगी रहीं।

जब मक्खियों का पेट भर गया, उन्होंने उड़ना चाहा। लेकिन उनके पंख शहद से चिपक गये थे। उड़ने के लिये वे जितना छटपटाती थीं, उतने ही उनके पंख चिपकते जाते थे। उनके सारे शरीर में शहद लगता जाता था।

बहुत-सी मक्खियाँ शहद में लोट-पोट होकर मर गयीं। बहुत-सी पंख चिपकने से छटपटा रहीं थीं। लेकिन दूसरी नयी-नयी मक्खियाँ शहद के लोभ से वहाँ आती-जाती थीं| मरी और छतपटाती मक्खियों कू देखकर भी वे शहद खाने का लोभ छोड़ नहीं पाती थीं।

मक्खियों की दुर्गति और मुर्खता देखकर मन में एक चिंतन उठता है कि- ‘जो लोग लोभ में पड़ जाते हैं, वे इन मक्खियों के समान ही मूर्ख होते हैं। मुख के स्वाद का थोड़ी देर का सुख उठाने के लोभ से वे अपना स्वास्थ्य नष्ट कर देते हैं, रोगी बनकर छटपटाते हैं और शीघ्र मृत्यु के ग्रास बनते हैं।’

वास्तव में मक्खी में तो बुद्धि अथवा विवेक नहीं परंतु मनुष्य एक अत्यंत विवेकशील प्राणी होते हुए भी अपनी इंद्रियों का गुलाम बना बैठा है। सत्य ज्ञान की अनुपस्थिति होने के कारण वह पांचों विकारों की जंजीरों से बंधा हुआ हर पल तड़पता है, छटपटाता है, और अंत में एक निरर्थक जीवन जीते हुए प्राण त्याग देता है। जबकि सच्ची सद्गति अथवा लिबरेशन तो विकारों को त्यागने में ही है !!

सदा याद रहे कि आप एक शांत और प्रेम स्वरूप परमआत्मा के ही अंशी हैं!

🍁🍁🍁💞 आपका जीवन आनन्दमय हो!💞🍁🍁🍁

गधे की मजार

*गधे की मजार*

एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गयाऔर उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था गधे के साथ। अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था! अब गधे के कारण आराम हैऔर गधा भी बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।

कुछ दिनों बाद गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी और कब्र के पास बैठकर रो ही रहा था कि उसके पास से ही एक राहगीर गुजरा। उस राहगीर ने सोचा कि *जरूर किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी है।*

तो वह व्यक्ति भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे! उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी उसे ठीक नहीं लगा और उसे यह भी समझ में आ रहा था कि *यह बड़ा उपयोगी व्‍यवसाय है।*

अब वह हर रोज उसी कब्र के पास बैठकर रोता और यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि *किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी और इस प्रकार गधे की कब्र किसी पहूंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी।*
ऐसे कई वर्ष बीते – *वह बंजारा बहुत धनी हो गया।*

संयोगवश एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, *“एक महान आत्‍मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना।”*

वह गया! देखा उसने इस बंजारे को बैठा! तो उसने कहा, *यह किसकी कब्र है यहा और तू यहां बैठा क्‍यों रो रहा है?”*

उस बंजारे ने कहा, *“अब आप से क्‍या छिपाना! जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्‍यादा साथ दे रहा है।”*

सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसाने लगा।

उस बंजारे ने पूछा – *“आप हंसे क्‍यों ?”*

फकीर ने कहा – *“तुम्‍हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहूंचे हएं महात्‍मा की कब्र है। उसी से तो मेरा भी काम चलता है।”*

बंजारे ने पूछा – *“वह किस महात्‍मा की कब्र है?”*

फकीर ने जवाब दिया- *“वह इसी गधे की मां की!*

जो लोग यह कहते हैं कि *केवल आस्था से ही ईश्वर की भक्ति संभव हैं उन्हें यह नहीं मालूम की बिना आत्मज्ञान के आस्था अन्धविश्वास कहलाती है और आत्मज्ञान समय के सदगुरु के द्वारा ही मिल सकता है!*

पक्का साधक

*💐💐पक्का साधक💐💐*

एक बार एक गुरूजी अपने शिष्यों को भक्ति का उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि *बेटा पक्के साधक बनो, कच्चे साधक ना बने रहो।*
कच्चे पक्के साधक की बात सुनकर एक नये शिष्य के मन में सवाल पैदा हुआ!

उसने पूछ ही लिया *“गुरूजी ये पक्के साधक कैसे बनते हैं?”*

गुरूजी मुस्कुराये और बोले – *बेटा सुन एक कहानी!*

एक गाँव में एक हलवाई रहता था। हलवाई हर रोज़ कई तरह की मिठाइयाँ बनाता था, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती थी। आस पास के गाँवो में भी हलवाई की बड़ी धाक जमी हुई थी! अक्सर लोग हलवाई की मिठाईयों और पकवानों का आनंद लेने आते थे!

एक दिन हलवाई की दुकान पर एक पति पत्नी आये और उनके साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था – जो बहुत ही चंचल था! उसके पिता ने हलवाई को हलवा बनाने का आदेश दिया!

वह दोनों तो प्रतीक्षा करने लगे लेकिन वह बच्चा बार–बार आकर हलवाई से पूछता कि – *“हलवा बन गया क्या?”*
हलवाई कहता – *“अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”

वह थोड़ी देर प्रतीक्षा करता और फिर आकर हलवाई को आकर पूछता – *“खुशबू तो अच्छी आ रही है, हलवा बन गया क्या?”*
हलवाई कहता – *“अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”*
*एक बार, दो बार, तीन बार उसके ऐसा बार बार पूछने से हलवाई थोड़ा चिढ़ गया!*
उसने एक प्लेट उठाई और उसमें कच्चा हलवा रखा और बोला – *“ले बच्चे खा ले!”*

बच्चे ने हलवा खाया और बोला – *“ये हलवा तो अच्छा नहीं है!”*

हलवाई फौरन बोला – *“अगर अच्छा हलवा खाना है तो चुपचाप जाकर वहाँ बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो।”*
इस बार बच्चा चुपचाप जाकर बैठ गया I

*जब हलवा पककर तैयार हो गया तो हलवाई ने थाली में सजा दिया और उन की टेबल पर परोस दिया!*

इस बार जब उस बच्चे ने हलवा खाया तो *उसे बहुत स्वादिष्ट लगा!* उसने हलवाई से पूछा – *“हलवाई काका! अभी थोड़ी देर पहले जब मैंने इसे खाया था, तब तो यह बहुत ख़राब लगा था. अब इतना स्वादिष्ट कैसे बन गया?”*

तब हलवाई ने उसे प्रेम से समझाते हुए कहा – *“बच्चे जब तू ज़िद कर रहा था, तब यह हलवा कच्चा था और अब यह पक गया है! कच्चा हलवा खाने में अच्छा नहीं लगता यदि फिर भी उसे खाया जाये तो पेट ख़राब हो सकता है. लेकिन पकने के बाद वह स्वादिष्ट और पोष्टिक हो जाता है!”*

अब गुरूजी अपने शिष्य से बोले *“बेटा. इस कहानी को सुनने के बाद *कच्चे और पक्के साधक का फर्क समझ में आया कि नहीं?”*

शिष्य हाथ जोड़ कर बोला – *गुरू जी “हलवे के कच्चे और पक्के होने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एक साधक के साथ यह कैसे होता है?”*

गुरूजी बोले – *बेटा साधक भी हलवाई की तरह ही है। जिस तरह हलवाई हलवे को आग की तपिश से धीरे धीरे पकाता है उसी तरह साधक को भी स्वयं को निरन्तर साधना से पकाना पड़ता है। जिस तरह हलवे में सभी आवश्यक चीज़ें डालने के बाद भी जब तक हलवा कच्चा है, तो उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता!*

उसी तरह एक सेवक भी चाहे कितना ही ज्ञान जुटा ले, कर्मकाण्ड कर ले- *जब तक सिमरन और भजन की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है!*

जिस तरह हलवे को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपने मन की चौकीदारी करते रहना चाहिए। जब पकते – पकते हलवे का रँग बदल जाये उसमें से खुशबु आने लगे और उसे खाने में आनन्द का अनुभव हो, तब उसे पका हुआ कहते है।

उसी तरह *जब साधना, साधक और साध्य तीनों एक हो जाये! साधक के अन्दर से प्रेम की खुशबू आने लगे तब समझना चाहिए कि साधक पक्का हो चुका है।*

जब तक सेवक का भजन अभ्यास पक्का न हो जाये, उसे सावधान और सतर्क रहना चाहिए ! क्योंकि *माया बड़ी ठगनी है कभी भी साधक को अपने रास्ते से विचलित कर सकती है।*

अतः *भक्त को निरंतर सिमरन और भजन से खुद को मजबूत बनाना चाहिए!*

*🙏🏿🙏🏽🙏🏼*जय सच्चिदानंद*🙏🏾🙏🏻🙏

सच्चा पारिवारिक सुख – बड़ों के सम्मान में

*सच्चा पारिवारिक सुख – बड़ों के सम्मान में*

पुत्र की उम्र पैंतालीस छूने लगी। पिता पुत्रको व्यापारमें स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मनमें चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी।

पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभाव में किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर खा लेते, कभी भूखे सो जाते।

जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ोंके प्रति आदर एवं सेवाका भाव था।

उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिताके प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मनमें दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया।

वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्रको खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुरके गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुरको खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनोंतक ऐसा ही चलता रहा। जब पतिको मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- *‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’*

बहू बोली- *‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें; इससे मुझे बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आनेपर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुपमें मिले हो। तुम्हारे मनमें कृतज्ञताका भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?”*

*पत्नीके सद्भाव ने पति की निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्रपर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्यमें हस्तक्षेप नहीं करते थे।*

*परिवारके किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।*

*शुभ प्रभात।*
🙏🎊🙏
*आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

न्याय प्रिय राजा 

💐💐न्याय प्रिय राजा 💐💐

एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य शनि देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ व स्तुति करता था।
एक दिन शनि देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा — “राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है?”
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला — “भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार से सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही इच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।”

“यह तो सम्भव नहीं है” — ऐसा कहते हुए शनि देव ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।
आखिरकार भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा और वे बोले — “ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।”
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगे। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड दिखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस और भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।
परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि और चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेंगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस और भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेंगे। इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस और भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे —
“देखो कितने लोभी हैं ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है..?”
सही बात है — रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हुआ हीरों का एक पहाड़ है। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण में वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहाँ सचमुच भगवान खड़े उनका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये और पूछा — “कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।” राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सर झुका दिया।
तब भगवान ने राजा को समझाया —
“राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!”

सार
जो जीव अपनी मन,बुद्धि और आत्मा से मेरी शरण में आते हैं, और सर्व लौकिक सम्बंधों को छोड कर मुझको ही अपना मानते हैं वो ही मेरे प्रिय बनते है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

*एक जापानी कथा है।* एक युवक विवाहित हुआ। अपनी पत्नी को ले कर

*एक जापानी कथा है।* एक युवक विवाहित हुआ। अपनी पत्नी को ले कर—समुराई था, क्षत्रिय था—अपनी पत्नी को लेकर नाव में बैठा। दूसरी तरफ उसका गांव था। बड़ा तूफान आया, अंधड़ उठा, नाव डावाडोल होने लगी, डूबने—डूबने को होने लगी। पत्नी तो बहुत घबड़ा गई। मगर युवक शांत रहा। उसकी शांति ऐसी थी जैसे बुद्ध की प्रतिमा हो। उसकी पत्नी ने कहा, तुम शांत बैठे हो, नाव डूबने को हो रही, मौत करीब है! उस युवक ने झटके से अपनी तलवार बाहर निकाली, पत्नी के गले पर तलवार लगा दी। पत्नी तो हंसने लगी। उसने कहा : क्या तुम मुझे डरवाना चाहते हो?

पति ने कहा : तुझे डर नहीं लगता? तलवार तेरी गर्दन पर रखी, जरा—सा इशारा कि गर्दन इस तरफ हो जाएगी।

*उसने कहा : जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे भय कैसा?*

उसने तलवार वापिस रख ली। उसने कहा : यह मेरा उत्तर है। जब तूफान—आधी उसके हाथ में है तो मैं क्यों परेशान होऊं? डुबाना होगा तो डूबेंगे, बचाना होगा तो बचेंगे। *जब तलवार मेंरे हाथ में है तो तू नहीं घबराती। मुझसे तेरा प्रेम है, इसलिए न! कल विवाह न हुआ था, उसके पहले अगर मैंने तलवार तेरे गले पर रखी होती तो? तो तू चीख मारती। आज तू नहीं घबडाती, क्योंकि प्रेम का एक सेतु बन गया। ऐसा सेतु मेरे और परमात्मा के बीच है, इसलिए मैं नहीं घबड़ाता। तूफान आए, चलो ठीक, तूफान का मजा लेंगे। डूबेंगे, तो डूबने का मजा लेंगे। क्योंकि सब उसके हाथ में है, हम उसके हाथ के बाहर नहीं हैं। फिर चिंता कैसी?*

*चितया दुःखं जायते……।*

*और कोई ढंग से चिंता पैदा नहीं होती, बस चिंता एक ही है कि तुम कर्ता हो। कर्ता हो तो चिंता है, चिंता है तो दुख।*

*इति निश्चयी सुखी शांत: सर्वत्र गलितस्पृह।*

ऐसा जिसने निश्चयपूर्वक जाना, अनुभव से निचोड़ा—वह व्यक्ति सुखी हो जाता है, शांत हो जाता है, उसकी सारी स्पृहा समाप्त हो जाती है।

शिष्य की भूल

*शिष्य की भूल”*

एक महात्मा बहुत ज्ञानी थे! साधना में लीन रहते थे। एक बार एक लड़का उनके पास आया। उसने उनसे अपना चेला बना लेने की पुरजोर प्रार्थना की। महात्मा जी ने सोचा, बुढ़ापा आ रहा है। एक चेला पास में होगा, तो सहारा बनेगा। यह सोचकर उन्होंने उसे चेला बना लिया।

चेला बहुत चंचल प्रकृति का था। ज्ञान-ध्यान में उसका मन नहीं लगता था। दिन-भर आने-जाने वालों से बातें करने और मस्ती करने में उसका समय व्यतीत होता। गुरु ने कई बार उसे समझाने की चेष्टा की पर सफलता नहीं मिली।

एक दिन चेला महात्माजी से बोला – *गुरुदेव ! मुझे कोई चमत्कार सिखा दें।*
गुरु ने कहा, *वत्स ! चमत्कार कोई काम की वस्तु नहीं है। उससे एक बार भले ही व्यक्ति प्रसिद्धि पा ले, लेकिन अंततोगत्वा उसका परिणाम अच्छा नहीं होता।* पर चेला अपनी बात पर अड़ा रहा।

बालहठ के सामने गुरुजी को झुकना पड़ा। उन्होंने अपने झोले में से एक पारदर्शी डंडा निकाला और चेले के हाथ में उसे थमाते हुए कहा, *यह लो चमत्कार। इस डंडे को तुम जिस किसी की छाती के सामने करोगे, उसके दोष इसमें प्रकट हो जाएंगे।* चेला डंडे को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।

गुरु ने चेले के हाथ में डंडा क्या थमाया, मानो बंदर के हाथ में तलवार थमा दी। कोई भी व्यक्ति आश्रम में आता, चेला हर आगंतुक के सीने के सामने उस डंडे को घुमा देता। फलत: उसकी कमजोरियाँ उसमें प्रकट हो जातीं और चेला उनका दुष्प्रचार शुरू कर देता।

गुरुजी सारी बात समझ गए। एक दिन उन्होंने चेले से कहा, *एक बार डंडा अपनी ओर भी घुमाकर देख लो, इससे स्वयं का परीक्षण हो जाएगा कि आश्रम में आ कर अपनी साधना से तुमने कितनी प्रगति की है।*

चेले को बात जंची, उसने फौरन डंडा अपनी ओर किया। लेकिन देखा कि *उसके भीतर तो दोषों का अंबार लगा है। शर्म से उसका चेहरा लटक गया।* वह तत्काल गुरु के चरणों में गिर पड़ा और अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए बोला, *आज से मैं दूसरों के दोष देखने की भूल नहीं करूँगा..!!*
*बुरा जो देखन मैं चला. बुरा न मिलिया कोय!*
*जो दिल खोजो आपना, मुझसे बुरा ना कोय!!*
🙏🙏🏾🙏🏼*सुप्रभात*🙏🏿🙏🙏🏻