The Melodies of Life

जिंदगी के सुर

रात के दो बजे का सन्नाटा था। सड़क के उस पार एक चाय का ठेला अब बुझ चुका था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और उसी सड़क के किनारे पुराने बेंच पर देव बैठा आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। उसकी आँखों में नींद नहीं, दर्द था। होंठों पर बस एक खामोश अरदास थी

“ए ज़िन्दगी, तू भी कभी माँ जैसी बन जा… ज़रा सी माँगूँ तो बाँहों में पूरा जहाँ दे दे।”

देव की ज़िन्दगी बहुत छोटी उम्र में ही बदल गई थी। जब वह बारह साल का था, तभी माँ दुनिया छोड़ गई। पिता ने ग़म भुलाने के लिए शराब का सहारा लिया, और घर का सारा बोझ देव के कंधों पर आ गया। बचपन की मासूम हँसी अब ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब चुकी थी।

दिन में कॉलेज, शाम को होटल में वेटर का काम, और रात को ऑनलाइन क्लास। देव के लिए ज़िन्दगी अब एक युद्ध थी। वो हर दिन लड़ता था—वक़्त से, हालात से, और कभी-कभी खुद से भी।

एक रात जब होटल के मैनेजर ने उसे झूठे आरोप में नौकरी से निकाल दिया, तो देव का सब्र टूट गया। वो सड़क पर भटकता हुआ उसी मोड़ तक चला गया, जहाँ कभी बचपन में माँ उसका हाथ पकड़कर स्कूल छोड़ने जाया करती थी। बेंच पर बैठते ही आँखें भर आईं—
“माँ… तू होती तो शायद कहती—मत डर बेटा, मैं हूँ यहाँ…”

वो देर तक आसमान की तरफ देखता रहा। उसी वक्त हवा का एक झोंका उसके चेहरे से टकराया। उसे लगा जैसे माँ ने माथे पर हाथ रखा हो। कानों में वही जानी-पहचानी आवाज़ गूँज उठी—
“बेटा, ज़िन्दगी केवल ठोकर ही नहीं देती, रास्ता भी दिखाती है। हर दर्द एक सबक है, हर गिरना सिखाता है कि कहाँ से संभलना है।”

देव ने आँखें पोंछीं और खुद से कहा—
“अब और नहीं टूटूंगा। माँ अगर ऊपर से देख रही होगी तो चाहेगी कि मैं कुछ बनूँ।”

अगले दिन उसने अपनी पुरानी गिटार और नोटबुक निकाली—वो जिसे उसने सालों से नहीं छुआ था। माँ कहा करती थी, “तेरे हाथों में सुर हैं बेटा, धुनों से तू दिलों को छू सकता है।”

देव ने छोटे-छोटे गाने बनाने शुरू किए, फिर उन्हें सोशल मीडिया पर गाने लगा। शुरुआत में किसी ने ध्यान नहीं दिया, पर उसने हार नहीं मानी। कुछ ही महीनों में उसकी धुनें लोगों के दिलों तक पहुँचने लगीं। एक दिन उसे एक बड़े म्यूज़िक लेबल से कॉल आया— “देव, हम तुम्हारा पहला सिंगल रिलीज़ करना चाहते हैं।”

वो पल देव के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। वह आसमान की तरफ देखकर बोला—
“देखा माँ, तूने कहा था ना—ज़िन्दगी भी माँ जैसी बन सकती है, बस उसे पहचानना सीखो…”

उसकी पहली रिलीज़ के दिन हर प्लेटफॉर्म पर उसकी धुन एक कहानी कह रही थी—दर्द, संघर्ष, उम्मीद और ममता की। और हर गाने के नीचे लिखा था—
“जो माँ से बढ़कर चाहत हो, वही असली ज़िन्दगी है।”

शाम को जब सुकून मिला, देव बाहर आया। ठंडी हवा चल रही थी। उसने आसमान की ओर देखा—तारे ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई आँखों से आशीर्वाद दे रहा हो।

और तभी उसे महसूस हुआ—
जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा हो—
“मत डर बेटा, मैं हूँ यहाँ…”

देव की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार उनमें दर्द नहीं था, सुकून था।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था—ज़िन्दगी ठोकर नहीं देती, रास्ता बनाती है। और जब इंसान हार मानने ही वाला होता है, तभी वो माँ बनकर उसे गले लगा लेती है। माँ का आशीर्वाद हर धुन में बसा है।

It was the dead of night, two o’clock in the morning. The tea stall across the street had already closed. A gentle, cool breeze was blowing, and Dev sat on an old bench by the roadside, gazing up at the sky. There was no sleep in his eyes, only pain. On his lips was a silent prayer:

“Oh, Life, please be like a mother to me sometimes… If I ask for just a little, give me the whole world in your arms.”

Dev’s life had changed at a very young age. When he was twelve, his mother passed away. His father turned to alcohol to forget his grief, and the entire burden of the household fell on Dev’s shoulders. The innocent laughter of his childhood was now crushed under the weight of responsibilities.

College during the day, working as a waiter in a hotel in the evening, and online classes at night. Life had become a battle for Dev. He fought every day—against time, against circumstances, and sometimes even against himself.

One night, when the hotel manager fired him on false charges, Dev’s patience snapped. He wandered down the street to the same corner where his mother used to take him to school, holding his hand, when he was a child. As he sat on the bench, his eyes filled with tears:
“Mom… if you were here, you would probably say—Don’t be afraid, son, I’m here…”

He looked up at the sky for a long time. Just then, a gust of wind brushed against his face. He felt as if his mother had placed her hand on his forehead. The familiar voice echoed in his ears:
“Son, life doesn’t just give you setbacks, it also shows you the way. Every pain is a lesson, every fall teaches you where to be careful.”

Dev wiped his eyes and said to himself:
“I won’t break down anymore. If Mom is watching from above, she would want me to become something.”

The next day, he took out his old guitar and notebook—the ones he hadn’t touched in years. His mother used to say, “You have music in your hands, son, you can touch hearts with your melodies.”

Dev started composing short songs and then began sharing them on social media. Initially, no one paid attention, but he didn’t give up. Within a few months, his melodies began to resonate with people. One day, he received a call from a major music label – “Dev, we want to release your first single.”

That moment was nothing short of a miracle for Dev. He looked up at the sky and said—
“See, Mom, you were right—life can be just like a mother, you just have to learn to recognize it…”

On the day of his first release, his melody was telling a story on every platform—a story of pain, struggle, hope, and maternal love. And beneath each song was written—
“The love that surpasses even a mother’s love is true life.”

In the evening, when he finally found some peace, Dev went outside. A cool breeze was blowing. He looked up at the sky—the stars were shining as if someone was blessing him with their eyes.

And then he felt it—
As if someone had whispered—
“Don’t be afraid, son, I am here…”

Tears streamed down Dev’s face, but this time they weren’t tears of pain, but of peace.
Because now he understood—life doesn’t give you setbacks, it creates a path. And just when a person is about to give up, life embraces them like a mother. A mother’s blessing is present in every melody.

The Coop Chickens

दड़बे की मुर्गी

एक शिष्य ने गुरुजी से पूछा, ‘गुरुजी हमें खुश रहने के लिए क्या चाहिए?’

गुरुजी ने पूछा, ‘तुम क्या सोचते हो ?’ शिष्य ने कहा, ‘मुझे लगता है कि अगर व्यक्ति की मूल जरूरतें पूरी हो रही हों, जैसे खाना, ओवास, रोजगार और सुरक्षा, तो वो व्यक्ति खुश रहेगा।’

गुरुजी शिष्य को एक दरवाजे के पास लेकर गए। वहां मुर्गी का दड़बा था। सैकड़ों मुर्गियां और चूजे बड़े पिंजड़ों में कैद थे।

गुरुजी ने पूछा, ‘क्या इन मुर्गियों को खाना मिलता है? क्या इनके पास घर है? क्या यहां ये कुत्ते-बिल्लियों से सुरक्षित हैं?

शिष्य ने कहा, ‘हां।’

गुरुजी ने पूछा, ‘क्या इनके पास कोई काम है?’ शिष्य ने कहा, ‘हां, ये यहां अंडे देती हैं।’

गुरुजी ने पूछा, ‘क्या यहां ये खुश हैं?’ शिष्य मुर्गियों को करीब से देखने लगा। उसे नहीं पता था कि कैसे पता

किया जाए कि कोई मुर्गी खुश है भी या नहीं? गुरुजी फिर उसे अपने साथ आगे ले गए। वहां पास ही एक मैदान में ढेर सारी 8 मुर्गियां और चूजे थे। वे ढूंढ़-ढूंढ़ कर दाना चुग रहे थे और खेल-कूद रहे थे। ‘क्या ये मुर्गियां खुश दिख रही हैं?’, गुरुजी ने पूछा।

शिष्य ने देखा, यहां मुर्गियां प्राकृतिक तरीके से रह रही हैं। वह दबी आवाज में बोला, ‘हां।’

गुरुजी बोले, ‘तुम्हारी परिभाषा के अनुसार दड़बे वाली मुर्गियां ज्यादा खुश होनी चाहिए थी ?’

गुरुजी बोले या तो हम दड़बे की मुर्गियों की तरह एक पिंजड़े में रहकर जी सकते हैं। एक ऐसा जीवन जहां हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। या फिर मैदान की उन मुर्गियों की तरह जोखिम उठाकर एक आजाद जीवन जीते हुए अपनी संभावनाएं टटोल सकते हैं। तुमने खुश रहने के बारे में पूछा था न ? तो यही मेरा जवाब है।

A disciple asked his guru, “Guruji, what do we need to be happy?”

The guru asked, “What do you think?” The disciple replied, “I think that if a person’s basic needs are met, such as food, shelter, employment, and security, then that person will be happy.”

The guru took the disciple to a doorway. There was a chicken coop there. Hundreds of chickens and chicks were confined in large cages.

The guru asked, “Do these chickens get food? Do they have shelter? Are they safe from dogs and cats here?”

The disciple said, “Yes.”

The guru asked, “Do they have any work?” The disciple replied, “Yes, they lay eggs here.”

The guru asked, “Are they happy here?” The disciple looked closely at the chickens. He didn’t know how to tell if a chicken was happy or not. The guru then led him further on. Nearby, in a field, there were many chickens and chicks. They were pecking for grain and playing. “Do these chickens look happy?” the guru asked.

The disciple observed that these chickens were living naturally. He whispered, “Yes.”

The guru said, “According to your definition, the chickens in the coop should have been happier, shouldn’t they?”

The guru continued, “We can either live like the chickens in the coop, confined to a cage, a life where we have no real existence. Or we can take risks like those chickens in the field, living a free life and exploring our potential. You asked about being happy, didn’t you? So this is my answer.”

Sri Aurobindo’s Passing

श्री अरविन्द का जाना

गत सप्ताह संसार के लिए एक चिन्ताजनक सप्ताह रहा और भारतमाता को अपने एक यशस्वी पुत्र के निधन से शोक संतप्त होना पड़ा। श्री अरविन्द सुविख्यात योगी, दार्शनिक तथा कवि ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपनी युवावस्था का सर्वोत्तम काल भारत की स्वतंत्रता तथा राष्ट्र-उत्थान के लिए अर्पित किया था। उन्होंने जितनी उच्च आध्यात्मिक साधना की, उतनी ही महान देश-सेवा भी। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राष्ट्रपति ने वास्तव में सारे मानव समाज की भावना व्यक्त की हैः ‘यद्यपि कतिपय भाग्यशाली लोग भी वर्ष के विशेष दिनों पर उनके देह को न देख सकेंगे, किन्तु वह अपने पीछे जो संदेश तथा आध्यात्मिकता की सुगंध छोड़ गये हैं, वह इस देश ही नहीं वरन विश्व की भावी पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी।’

जबकि युद्ध के नगाड़ों की आवाज तेज होती जा रही है, हतभागी संसार महात्मा गांधी, श्री अरविन्द, श्री बर्नार्ड शा जैसे शांति व मानवता के प्रेमियों व दूरदर्शी मनीषियों को खोता जा रहा है। नेहरूजी के शब्दों में आज की समस्या केवल दो या तीन शब्दों में वर्णन की जा सकती है और वे हैं युद्ध या शांति। इन दो में से एक को वरण किये बिना और कोई मार्ग नहीं। कोरिया में चीनी सेनाओं-अथवा पेकिंग सरकार के शब्दों में चीनी स्वयंसेवकों के रणक्षेत्र में उतर आने से आग और भड़क उठी थी। फिर राष्ट्रपति टूमन की अणुबम के प्रयोग की धमकी ने उसमें घी की आहुति डालने का काम किया। अमरीकी राष्ट्रपति की इस धमकी से एशिया में चिन्ता तथा रोष का संचार तो हुआ ही, अमरीका का अन्यतम साथी ब्रिटेन भी चिन्ताकुल हो उठा। उसने भी अणुबम के प्रयोग की बात का विरोध किया और तुरन्त ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री एटली उच्चाधिकारियों को साथ लेकर राष्ट्रपति टूमन से बातचीत करने के लिए वाशिंगटन पहुंचे। राजनीतिक क्षेत्रों ने इस चर्चा को इतना अधिक महत्व दिया कि एटली-टूमन भेंट को गत युद्धकालीन चर्चिल-रूजवेल्ट भेंट के समान ऐतिहासिक भेंट बताया। और इसमें सन्देह नहीं कि यदि साम्यवादी तथा साम्यवाद-विरोधी गुट अपने हठ को त्यागकर शांति व समझौते का कोई हल नहीं निकालते हैं और अंतरराष्ट्रीय विस्फोट नहीं रुकता है, तो यह भेंट भी चर्चिल व रूजवेल्ट की युद्धकालीन भेंट के समान ही सिद्ध होगी।

Last week was a somber one for the world, and Mother India mourned the loss of one of her illustrious sons. Sri Aurobindo was not only a renowned yogi, philosopher, and poet, but he also dedicated the best part of his youth to India’s independence and national progress. His spiritual pursuits were as profound as his service to the nation. Paying tribute to him, the President truly expressed the sentiments of all humanity: “Although a few fortunate souls will not be able to see his body on special days of the year, the message and the fragrance of spirituality he left behind will continue to inspire future generations not only in this country but across the world.”

While the drumbeats of war grow louder, the wretched world is losing visionaries and visionaries, lovers of peace and humanity like Mahatma Gandhi, Sri Aurobindo, and Shri Bernard Shaw. In Nehru’s words, today’s problems can be summed up in just two or three words: war or peace. There was no other way but to choose one of these two. The arrival of Chinese forces—or, in the words of the Peking government, Chinese volunteers—on the battlefield in Korea had further fueled the fire. President Truman’s threat to use the atomic bomb added fuel to the fire. This threat by the American president not only sparked concern and anger in Asia, but also alarmed Britain, America’s closest ally. It also opposed the use of the atomic bomb, and British Prime Minister Attlee immediately arrived in Washington with senior officials to hold talks with President Truman. Political circles attached such great importance to the Attlee-Truman meeting that it was hailed as a historic one, comparable to the Churchill-Roosevelt meeting during the last war. And there is no doubt that if the communist and anti-communist blocs do not abandon their stubbornness and find a solution for peace and reconciliation, and the international turmoil does not stop, this meeting will prove to be as historic as the wartime meeting between Churchill and Roosevelt.

Great

महान

एक बच्चा अपने पिता से पूछता है- ‘पापा, आखिर महान शब्द का मतलब क्या होता है? मैंने बहुत जगह पढ़ा है कि वो व्यक्ति महान था, उसने ये किया, उसने वो किया, आप मुझे समझाओ महान लोग कौन होते हैं और वे महान कैसे बनते हैं?’ पिता ने बेटे को महान शब्द का अर्थ समझाने की एक तरकीब सोची। उन्होंने

बेटे से कहा-‘चलो दो पौधे लेकर आते है। एक को घर के अंदर लगा देते है और दूसरे को घर के बाहर। पौधे लगाने के बाद पिता ने पूछा- ‘बेटा, तुम्हें क्या लगता है इन दोनों पौधों में से कौन-सा पौधा बड़ा होगा और सुरक्षित रहेगा?’ बेटे ने कहा, ‘पिता जी ये भी कोई पूछने वाली बात है। जो पौधा हमारे घर के अंदर है, वो सुरक्षित है और वही बड़ा और विशालकाय भी बनेगा। बाहर वाला पौधा बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। उसे बहुत सारे मौसम झेलने होंगे। उसे कोई जानवर भी खा सकता है।’ पिता जी शांत रहे और कहा बेटे से कहा कि मैं वक्त आने पर इस सवाल का जवाब दूंगा। बेटा पढ़ाई करने चार सालों के लिए बाहर चला जाता है और जब वापस आता है, तो घर के अंदर के पौधे को देखकर कहा- ‘पापा मैंने कहा था न कि इस पौधे को कुछ नहीं होगा।’ पिता मुस्कुराए और कहा- ‘बेटा जरा बाहर जाकर उस दूसरे पौधे को देखकर आओ।’

बाहर एक बहुत बड़ा पेड़ था। बेटे को यकीन नहीं हुआ कि वह पौधा इतने बड़े पेड़ में कैसे तब्दील हो गया, जबकि घरवाला तो इससे बहुत छोटा है। पिता ने बेटे को समझाया कि यह इतना बड़ा पेड़ इसलिए बन पाया, क्योंकि इसने हर मौसम और हजारों मुश्किलों का सामना किया है। अंदर वाले पौधे ने किसी चुनौती का सामना नहीं किया। न ही उसे धूप मिली, इसलिए वह बड़ा नहीं बन पाया। पिता ने कहा-‘बेटा याद रखना- इस पेड़ की तरह दुनिया में वही व्यक्ति महान बन सकता है, जिसने हजारों मुश्किलों का सामना किया हो। जो व्यक्ति घरवाले पेड़ की तरह जीवन भर सुरक्षित रहने की सोचेगा, वो कभी महान नहीं बन पाएगा।’

A child asks his father, “Dad, what does the word ‘great’ mean? I’ve read many times that this person was great, that he did this, that he did that. Please explain to me who great people are and how they become great.” The father thought of a way to explain the meaning of the word great to his son. He

said to his son, “Let’s get two plants. Plant one inside the house and the other outside.” After planting the plants, the father asked, “Son, which of these two plants do you think will grow and remain safe?” The son replied, “Father, is this even a question worth asking? The plant inside our house is safe and will grow to be large and gigantic. The plant outside is not safe at all. It will have to endure many weather conditions. An animal might even eat it.” The father remained calm and told his son, “I will answer this question when the time comes.” The son went away for four years to study. When he returned, he looked at the plant inside the house and said, “Dad, I told you nothing would happen to this plant.” The father smiled and said, “Son, go outside and see that other plant.”

There was a huge tree outside. The son couldn’t believe how that plant had grown into such a large tree, while the one at home was much smaller. The father explained to him that this tree had become so large because it had endured every season and thousands of difficulties. The plant inside faced no challenges. It didn’t receive any sunlight, so it couldn’t grow big. The father said, “Son, remember—like this tree, only a person who has faced thousands of difficulties can become great in the world. A person who, like the tree at home, thinks of staying safe all his life will never become great.”

Do your work

कर्म करो

एक बार एक गरीब किसान ने गांव के जमीदार से कहा, ‘आप एक साल के लिए अपना एक खेत मुझे उधार दे दीजिए। मैं उस खेत में मेहनत करके खेती करूंगा। जमींदार दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को एक खेत एक साल के लिए उधार दे दिया। इतना ही नहीं, किसान की मदद के लिए उसने पांच व्यक्ति भी दिए। वह किसान उन पांच व्यक्तियों के साथ खेत में काम करने लगा।

एक दिन किसान ने सोचा जब पांच लोग खेत में काम कर रहे हैं, तो मेरी क्या जरूरत हैं? यह सोचकर वह घर वापस आ गया और मीठे-मीठे सपने देखने लगा, जब उसकी फसल से उसे मोटी कमाई होगी और वह अमीर बन जाएगा। अब वह खेत पर कम जाने लगा। वहीं किसान को जो पांच सहायक मिले थे, वे अपनी मनमर्जी से काम करने लगे। जब मन आता खाद डाल देते और कई-कई दिन पानी नहीं देते। समय बीत रहा था और फसल कटने का समय आ चुका था।

किसान ने जब फसल देखी तो सिर पकड़ लिया। फसल अच्छी नहीं हुई थी। उसे उतना पैसा भी नहीं मिल रहा था, जितना उसने अब तक खर्च किया था। एक साल पूरा हो जाने के बाद जमींदार किसान से खेत वापस लेने आया। जमींदार को देखकर वह किसान रोने लगा और फिर से एक साल का समय मांगने लगा। किसान की बात सुनकर जमींदार बोला, ‘यह मौका बार-बार नहीं मिलता।’

दोस्तो, वह दयालु जमींदार हमारी कुदरत है, हमारा ईश्वर है। हम किसान हैं। खेत हमारा शरीर है। पांच सहायक पांच इंद्रिया हैं। आप इनका उपयोग कैसे करते हैं, यह आप पर निर्भर करता है।

Once a poor farmer asked the village landlord, “Please lend me your field for a year. I will work hard on it.” The landlord was a kind man. He lent the farmer his field for a year. Furthermore, he also provided five men to help him. The farmer began working with them.

One day, the farmer thought, “If five men are working on the field, what need am I?” Thinking this, he returned home and began dreaming sweet dreams of a rich harvest. He began going to the field less often. Meanwhile, the five helpers he had found began acting as they pleased. They would apply fertilizer whenever they wanted and often skip watering for days. Time passed, and the harvest was near.

When the farmer saw the crop, he was distraught. The harvest was not good. He wasn’t even earning enough money to cover his expenses. After a year had passed, the landowner came to take the land back from the farmer. Seeing the landowner, the farmer began to cry and asked for another year’s time. Hearing the farmer’s words, the landowner said, “This opportunity doesn’t come often.”

Friends, that kind landowner is our nature, our God. We are farmers. The land is our body. The five senses are our helpers. How you use them is up to you.

Intention

नीयत

एक नगर में रहने वाले एक पंडितजी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गांव में मंदिर के पुजारी का निधन होने की वजह से उन्हें वहां का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की ओर जाने के लिए बस में चढ़े। उन्होंने टिकट के लिए कंडक्टर को रुपये दिए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए, तो पंडितजी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं।

पंडितजी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि वह बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे हैं। बस वाले लाखों कमाते हैं। बेहतर है इसे भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। मन में चल रहे विचारों के बीच उनका स्टॉप आ गया। बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके और उन्होंने जेब में हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, ‘भाई तुमने मुझे दस रुपये ज्यादा दे दिए थे।’

कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, ‘क्या आप ही नए पुजारी हैं ?!

पंडितजी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला कि मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी। आपको बस में देखा तो खयाल आया कि चलो देखते हैं कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूं, तो आप क्या करते हो ? अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है, जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए।’ बस से उतरते समय पंडितजी पसीना-पसीना हो गए थे। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया, ‘हे प्रभु, मैंने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी, पर आपने सही समय पर मुझे संभाल लिया।’

A priest living in a town was renowned far and wide. After the death of the temple priest in a nearby village, he had been appointed priest there. Once, he boarded a bus to his destination. He gave the conductor money for his ticket. When the conductor deducted the fare and returned the money, Panditji realized he had overpaid ten rupees.

Panditji decided to return the money to the conductor after a while. After a while, the thought occurred to him that he was unnecessarily worried about a small sum like ten rupees. Bus drivers earn lakhs. It would be better to consider this a gift from God and keep it for himself. While his thoughts swirled in his mind, his stop arrived. As he got off the bus, he suddenly paused. He reached his pocket, took out a ten-rupee note, and handed it to the conductor, saying, “Brother, you overpaid me ten rupees.”

The conductor smiled and said, “Are you the new priest?!”

When Panditji agreed, the conductor said, “I had been wanting to hear your sermons for many days. When I saw you on the bus, I thought, let’s see what you do if I pay you more. Now I am convinced that your conduct is as good as your sermons, from which everyone should learn.” Panditji was sweating profusely as he got off the bus. He folded his hands and thanked God, “Oh Lord, I had bid for your teachings for the sake of ten rupees, but you saved me at the right time.”

Marks

निशान

समीर के बूढ़े पिताजी चलते समय दीवार का सहारा लेते थे। दीवारों पर जगह-जगह उनकी उंगलियों के निशान थे। समीर की पत्नी उससे अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों की शिकायत करती थी। एक दिन पिताजी को सिरदर्द था। उन्होंने सिर पर तेल मालिश की थी। हाथ पर चिकनाई थी, तो चलते समय दीवार पर कुछ तेल के निशान बन गए।

समीर की पत्नी को गुस्सा आ रहा था। समीर ने भी पिता से बदतमीजी से बात की। अब पिताजी ने चलते समय दीवार पकड़ना बंद कर दिया। एक दिन वे गिर पड़े और कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया। इसके बाद समीर कभी खुद को माफ नहीं कर पाया।

कुछ समय समीर के घर में पेंट होना था। जब पेंटर आए, तो समीर के बेटे ने अपने दादा की उंगलियों के निशानों को पेंट करने से मना कर दिया। पेंटर ने उन निशानों के चारों ओर एक सुंदर डिजाइन बना दिया। अब वे निशान समीर के घर का हिस्सा बन गए। सब उस डिजाइन की प्रशंसा करते। समय के साथ समीर बूढ़ा हो गया। अब उसे सहारे की जरूरत थी। पिता को कहे शब्दों को याद कर, वह बिना सहारे के चलने की कोशिश करने लगा। पर, तभी समीर का बेटा आया, उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा और दीवार का सहारा लेने के लिए कहा। वह रोने लगा, उसने सोचा, ‘अगर मैं भी अपने बेटे जैसा होता, तो पिता कुछ समय और जीवित होते।’ इतने में कमरे में समीर की पोती, अपनी ड्रॉइंग की कॉपी लेकर आई। उसकी टीचर ने उसकी तारीफ की थी और उस पर एक नोट लिखा था। वो ड्राइंग दीवार पर समीर के पिता के हाथ के निशान की थी। टीचर ने लिखा था- काश हर बच्चा बड़ों से इसी तरह प्यार करता। यह देख समीर अपने पिता की तस्वीर के आगे खड़ा माफी मांगता रहा।

Sameer’s old father used to lean on the wall while walking. His fingerprints were all over the walls. Sameer’s wife often complained to him about the dirty walls. One day, his father had a headache and massaged his head with oil. His hands were greasy, so some oil marks appeared on the wall while walking.

Samir’s wife was furious. Sameer also spoke rudely to his father. Now, his father stopped holding the wall while walking. One day, he fell and died a few days later. After this, Sameer never forgave himself.

Some time ago, Sameer’s house was due for painting. When the painter arrived, Sameer’s son refused to paint over his grandfather’s fingerprints. The painter drew a beautiful design around the marks. Now, those marks became a part of Sameer’s house. Everyone admired that design. Over time, Sameer grew old. Now, he needed support. Remembering the words he had said to his father, he tried to walk without support. But then Sameer’s son came, held his father’s hand and asked him to lean on the wall. He started crying, thinking, ‘If I had been like my son, my father would have lived a little longer.’ Just then, Sameer’s granddaughter came into the room with a copy of her drawing. Her teacher had praised it and written a note on it. The drawing was of Sameer’s father’s handprint on the wall. The teacher had written, ‘I wish every child loved elders like this.’ Seeing this, Sameer stood in front of his father’s photo and kept apologizing.

Three Thieves

तीन चोर

एक गांव में तीन चोर रहते थे। एक रात उन्होंने एक धनी आदमी के यहां चोरी की। उन्होंने सारा धन एक थैले में भरा और उसे लेकर जंगल की ओर भाग निकले। वे तीनों सुबह से काम पर निकले हुए थे। जंगल में पहुंचने पर उन्हें जोर की भूख लगी, पर वहां खाने को कुछ नहीं था, इसलिए उनमें से एक चोर पास के एक गांव में खाना लेने गया। बाकी दोनों चोर जंगल में चोरी के माल की रखवाली कर रहे थे।

जो चोर खाना लेने गया था, उसकी नीयत खराब हो गई थी। पहले उसने होटल में खुद भोजन किया और फिर उसने अपने साथियों के लिए खाना खरीद कर उसमें तेज जहर मिला दिया। उसने सोचा कि जहरीला खाना खाकर उसके दोनों साथी मर जाएंगे, तो सारा धन उसका हो जाएगा। यही सोचकर वह दोस्तों की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगा।

इधर जंगल में दोनों चोरों ने खाना लेने गए अपने साथी चोर की हत्या करने की योजना बना ली थी। वे उसे अपने रास्ते से हटाकर सारा धन आपस में बांट लेना चाहते थे। वे भी बेसब्री से उस चोर के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे।

तीनों चोरों ने अपनी-अपनी योजनाओं के अनुसार कार्य किया। पहला चोर जैसे ही जहरीला भोजन लेकर जंगल में पहुंचा। उसके दोनों साथी उस पर टूट पड़े। उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया, फिर वे भोजन करने बैठ गए। मगर जहरीला भोजन खाते ही वे दोनों भी तड़प-तड़प कर मर गए। इस प्रकार तीनों का अंत भी बुरा ही हुआ।

Three thieves lived in a village. One night, they stole from a wealthy man. They packed all the money into a bag and fled into the forest. All three had been out on a mission since morning. Upon reaching the forest, they felt very hungry, but there was nothing to eat. So one of them went to a nearby village to get food. The other two thieves were guarding the stolen goods in the forest.

The thief who had gone to get food had evil intentions. First, he ate at a hotel, then bought food for his companions and mixed it with a strong poison. He thought that if his companions died after eating the poisoned food, he would inherit all the money. With this thought in mind, he began to move quickly towards his friends.

Meanwhile, in the forest, the two thieves had hatched a plan to murder their fellow thief who had gone to get food. They wanted to remove him from their path and divide the money among themselves. They also waited impatiently for the thief to return.

The three thieves acted according to their plans. As soon as the first thief arrived in the forest with the poisoned food, his two companions pounced on him. They finished him off, then sat down to eat. But upon eating the poisoned food, they both died in agony. Thus, all three met a disastrous end.

Bad Times

बुरा समय

एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधु ने उसे एक ताबीज दिया। साधु ने कहा, ‘राजन, इसे गले में पहन लो। जब तुम्हें लगे कि अब सब खत्म होने वाला है, कोई आशा की किरण न हो, तब इसे खोलकर पढ़ लेना। याद रखें, उससे पहले इसे नहीं पढ़ना।’

राजा ने साधु की बात मानी। एक बार शिकार करते समय राजा अपने सैनिकों से बिछड़कर दुश्मनराजा की सीमा में प्रवेश कर गया। दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज सुनकर राजा तेजी से भागा। राजा को लगातार दुश्मन राज्य के सैनिकों के घोड़ों की टापें सुनाई दे रही थीं। भूख-प्यास से बेहाल राजा को एक गुफा दिखी, जिसमें वह छिप गया। दुश्मन करीब आने लगे और राजा को अंत नजर आने लगा।

निराशा में उसका हाथ ताबीज पर गया और उसे साधु की बात याद आई। उसने तुरंत ताबीज खोला।

उसमें एक पर्ची रखी थी। राजा ने पर्ची निकाली। उस पर लिखा था- ‘यह बुरा समय भी कट जाएगा।’

राजा को यह पढ़कर अकथनीय शांति मिली। उसे लगा कि सचमुच यह भयानक समय भी निकल जाएगा। हुआ भी यही। दुश्मन के घोड़ों की आवाज पास आते-आते दूर जाने लगी। अब वहां किसी के होने की आवाज नहीं आ रही थी। राजा रात में गुफा से बाहर निकला और किसी तरह अपने राज्य में सुरक्षित वापस आ गया।

दोस्तो, यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में जब भी निराशा और हताशा हो, तो हमें शांति से बैठकर गहरी सांस लेनी चाहिए और इस ब्रह्मांड पर भरोसा रखते हुए कहना चाहिए- ‘यह बुरा समय भी कट जाएगा।’ एक बार इसे आजमाकर देखें, यह विचार हमें उस कठिन परिस्थिति से उबरने, हौसला बनाए रखने की शक्ति देगा।

Pleased with a king’s service, a sage gave him an amulet. The sage said, “King, wear this around your neck. When you feel that everything is about to end, that there is no ray of hope, open it and read it. Remember, do not read it before then.”

The king obeyed the sage’s advice. Once, while hunting, he became separated from his soldiers and entered the enemy’s territory. Hearing the sound of the enemy’s horses’ hooves, the king ran quickly. He could hear the enemy’s horses’ hooves continuously. Driven by hunger and thirst, the king found a cave and hid in it. The enemies began to draw closer, and the king’s end became apparent.

In desperation, his hand fell on the amulet and he remembered the sage’s words. He immediately opened it.

A note was placed inside. The king took out the note. It read, “This bad time will also pass.”

Reading it, the king felt an indescribable peace. He felt that this terrible time would indeed pass. And that’s exactly what happened. The sound of the enemy’s horses coming closer and then fading away. There was no sign of anyone being there anymore. The king left the cave at night and somehow returned safely to his kingdom.

Friends, this story teaches us that whenever we face disappointment and despair in life, we should sit quietly, take a deep breath, trust in the universe, and say, “This bad time too shall pass.” Give it a try; this thought will give us the strength to overcome that difficult situation and maintain our courage.

You go to sleep hugging your wife at night, and hug her all night, and wake up in the morning happy.

रात में पत्नी से लिपट कर सो जाओ, और रात भर आलिंगन करो, सुबह उठो तो पत्नी खुश। और जब पत्नी खुश तो मैं खुश, और जब मैं खुश तो पूरा परिवार खुश।

शादी की उम्र हो रही थी और मेरे लिए लड़कियां देखी जा रही थीं। मैं मन ही मन में काफी खुश था कि चलो कोई तो ऐसा होगा जिसे मैं अपना हमसफर बोलूंगा, जिसके साथ जब मन करे प्यार करूंगा। मेरी अच्छी खासी नौकरी थी, घर में बूढ़ी मां और पापा थे, और इतनी कमाई थी कि अपने पत्नी का खर्चा उठा सकूं। ये सारी बातें सोच-सोचकर खुश होता था। मां की उम्र भी हो गई थी, तो एक प्वाइंट ये भी लोगों को बताता कि मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं, ये तो मां हैं जिनकी उम्र निकल रही है, उनके लिए शादी करनी है। मां ने भी लोग मेरी बात मानते, लेकिन मन ही मन में तो मैं भी चाहत थी कि मेरी शादी हो जाए।

मेरी शादी दिव्या से फिक्स हो गई। मैंने दिव्या को बोला कि हम आगे जाकर बहुत अच्छी जिंदगी जीने वाले हैं, क्योंकि मेरे घर में कोई नहीं है। बस तुम्हें मेरे मां-बाप का ध्यान रखना होगा। दिव्या ने तुरंत बोला, “आपके मां-बाप भी मेरे मां-बाप हो जाएंगे शादी के बाद।” दिव्या की अच्छी बातों से मुझे दिन-रात और ज्यादा प्रेम होने लगा था। कभी परिवार संभालने की बातें, कभी शरारत भरी रोमांटिक बातें सुनकर मैं बहुत खुश था।

मानो एक परफेक्ट जिंदगी मुझे मिल गई हो। शादी के बाद हम दोनों घूमने गए, सब कुछ बहुत अच्छा था। ना जाने क्यों इस पल हम दोनों को ऐसा लगता था कि बस हम एक-दूसरे से लिपटे रहें। अब जिनकी शादी हुई होगी, वो समझ पा रहे होंगे कि मैं क्या बोलना चाहता हूं।

घूमने के बाद जब घर आया, तो ज्यादातर समय ऑफिस के लिए ही होता था। छुट्टी में जब कभी मम्मी-पापा बाहर जाते, तो दिव्या मैडम मूड में रहती थी। कब, क्या, कहां, कैसे हो जाता था, पता नहीं चलता था।

मुझे अब लगने लगा था कि एक ऐसी पत्नी मिली है, जो घर की जरूरतों को समझती है, साथ में मेरी शारीरिक जरूरतों का भी ध्यान रखती है। संबंध बनाने के लिए खुद ही पहल करती है, और यदि कभी मैं कर दूं तो माना नहीं करती बल्कि पूरा साथ देती है। अब जिंदगी में इससे अच्छा क्या होगा? फालतू में मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी मत करो, लाइफ खराब हो जाती है।

हमारी शादी को 2 महीने हुए थे, दिव्या ने बोला, “अजी, मुझे साड़ी में दिक्कत होती है, क्या मैं घर पर सूट पहन सकती हूं?”

मैंने तुरंत बोला, “हां, क्यों नहीं पहन सकती हो, चलो अभी दिलाता हूं।” हम दोनों बाजार से घर आए, मम्मी ने उसके हाथ में सूट देखा, कुछ बोली नहीं।

अगली सुबह जब वह नहाकर सूट पहनकर निकली, तो मम्मी ने बोला, “तुमने सूट क्यों पहन लिया? हमारे यहां शादी के 6 महीने तक नई बहू को सिर्फ साड़ी पहननी होती है। रोज कोई न कोई देखने आता है, सबके सामने सूट पहनकर जाओगी, अच्छा नहीं लगेगा। और बार-बार दिन भर कपड़ा बदलो, ये भी अच्छा नहीं है।”

इस पर दिव्या ने मां को सॉरी बोला और बोली, “मैंने तो इनसे पूछकर लिया था।”

तभी मां बोलती हैं, “ये कौन होता है ये सब डिसाइड करने वाला? अभी मैं हूं तो मैं करूंगी, जब मैं मर जाऊं तो जैसे मन वैसे रहना।”

इसे सुनने के बाद आज मुझे पहली बार घर में अपनी औकात का पता चला। मासूमियत से दिव्या मेरी तरफ देख रही थी, शायद ये बताना चाहती थी कि मेरी वजह से उसे डांट पड़ गई।

पत्नी प्रेम में लिप्त होकर मैंने मां से बोल दिया, “अरे मम्मी, उसकी गलती नहीं है, मुझसे पूछी थी वो।”

मां ने तुरंत बोला, “2 महीने हुआ नहीं और आगए पत्नी का पक्ष लेने। इस घर में मालिक मैं हूं या तुम हो?”

अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था, हम दोनों एक-दूसरे को देखे और अंदर चले गए।

इस बात से दिव्या डर गई थी और अब वह हर काम मां से पूछकर करने लगी। लेकिन मां के लिए ये भी एक आफत था, अब उनका कहना था कि तुम 28 साल की हो, तुम्हें खुद बुद्धि होनी चाहिए कि क्या करना है, क्या नहीं। हर चीज के लिए मेरे पास मत आया करो।

लेकिन अब इस बार दिव्या भी चिढ़ गई, पर मां कुछ बोली नहीं। जब मैं ऑफिस से आया तो अंदर आते ही मां बोलने लगी, “तुम्हारी धर्मपत्नी को बुद्धि नाम की चीज नहीं है।” मैंने मां को समझाया कि जाने दो, सीख जाएगी, थोड़ा समय दो। इस पर मां ने मुझसे मुंह फूला लिया और उदास रोते मन से कहा, “तुम बदल गए हो।” और पीछे से धीरे-धीरे मेरे पिता जी देखते हुए हंस रहे थे, मानो ऐसा जता रहे हों कि कैसे उन्होंने पहले ही भविष्य देखा हुआ था।

इसके बाद कमरे में गया तो वहां दिव्या का मुंह खुला हुआ था। कमरे में घुसते ही उसने मुझसे बोला, “मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, मां कभी खुश नहीं होती। हर चीज की एक सीमा होती है और यह सारी बातें सीमा से भी ऊपर हैं।”

मैंने उसे पकड़ा और बोला, “घबराओ मत, थोड़ा समय लगेगा मां को संभालने में, क्योंकि तुम्हारे अलावा उनका कोई और नहीं है। वह तुम्हें अपना मानती हैं इसलिए तुमसे ऐसी बातें करती हैं। चलो, चल के नीचे खाना खाते हैं, बहुत तेज भूख लगी है।”

ऐसा बोलकर हम नीचे आते हैं और मैं मन में ही सोचता हूं, दिव्या को तो मैं धीरे से किसी भी तरह से मना लूंगा, एक रात की बात है, एक बार जहां लिपट के सोया, सब कुछ सुबह ठीक हो जाएगा। मां के लिए कुछ सोचना पड़ेगा।

नीचे खाना खाने के बाद मैं और दिव्या अपने कमरे में जाते हैं। दिव्या अभी भी थोड़ी नाराज लग रही थी। मैंने उसे बोला, “क्यों मन की बात का इतना बुरा मानती हो?” उसने तुरंत मुझसे बोला, “मेरी कोई गलती भी नहीं होती और हर चीज के लिए मुझे दोषी ठहरा दिया जाता है। मैं कुछ अच्छा भी करने जाती हूं तो उसमें भी मेरी बुराई निकल जाती है।”

मैंने उसे जोर से गले लगाया और बोला, “ऐसा कुछ नहीं है, समय के साथ सारी चीज ठीक हो जाएगी।” और अब बारी थी कुछ करने की, लेकिन उसने मुझे अपने से दूर कर दिया और बोला, “मेरा मन नहीं है।”

अब जो मुझे लगता था कि एक रात लिपट के सोने से अगली सुबह सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह बातें झूठी समझ आने लगीं। धीरे-धीरे हर छोटी-छोटी चीज पर घर में लड़ाई झगड़ा होने लगे। मां को दिव्या की कुछ चीजें पसंद नहीं आतीं और दिव्या को मां की बहुत सारी चीजें नहीं पसंद आतीं।

दिव्या का कहना था कि घर उसका भी है और हर छोटी चीज के लिए परमिशन लेना उसे ठीक नहीं लगता। उधर मां का कहना था कि इस गृहस्थी को मैंने बसाया है और तुम्हें हैंडओवर किया है, इसलिए अभी भी इसकी मालकिन मैं ही हूं। तुम्हें जो भी पूछना है मुझसे पूछ कर करो।

दोनों अपनी बात पर बिल्कुल सही थीं। एक तरफ दिव्या, जिसके साथ मुझे पूरी जिंदगी बितानी थी, दूसरी तरफ मेरी मां, जिन्होंने इस गृहस्ती को संभाला था, मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया था। लेकिन इन दोनों की लड़ाई का असर सीधा-सीधा मेरे ऊपर दिख रहा था और मैं पिसता जा रहा था।

धीरे-धीरे बात कहीं ज्यादा बढ़ने लगी और घर में प्रतिदिन लड़ाई झगड़े की नौबत आ गई। अब मुझे भी लगने लगा था कि जो मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी करने से बहुत ज्यादा खुशी नहीं मिलती, बल्कि लाइफ में टेंशन आता है, वह क्यों बोलते थे।

इसी तरह एक दिन अत्यधिक बात बढ़ने पर मैं रात को दोनों लोगों के कमरे में गया। सबसे पहले मैं मां के कमरे में गया और मां को समझाया, “देखो मां, तुम दोनों के झगड़े की वजह से मेरा करियर खराब हो रहा है और मैं ठीक से रह नहीं पा रहा हूं। मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता और ना मैं दिव्या को छोड़ सकता हूं। तो इसलिए थोड़ी नरम हो जाओ, जो चीज जैसे चल रही है, चलने दो।” इस बार मैं थोड़ा कठोर था।

मां से तुरंत बोलने के बाद मैं अपनी पत्नी के कमरे में गया और यही बात उससे भी कही, “देखो, मां की उम्र हो चुकी है। यदि तुम यह सोच रही हो कि मां अपने आप को बदल सकती हैं, तो यह होना मुमकिन नहीं है। बदलना तुम्हें खुद को होगा, जिसमें मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगा। मैं ना तुम्हें छोड़ सकता हूं, क्योंकि तुम मेरा भविष्य हो, और ना मैं अपनी मां को छोड़ सकता हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोस कर इस लायक बनाया है।

तो कोई बीच का रास्ता निकालो और घर में शांति से रहो।”

यह बात होने के कुछ दिन बाद तक तो चीजें ठीक थीं, लेकिन धीरे-धीरे चीजें फिर से बिगड़ने लगीं। जब भी मैं ऑफिस से घर आता तो घर में घुसते ही मां दिव्या की बुराई करतीं और अपने कमरे में घुसते ही दिव्या मां की बुराई करती। मुझे समझ में नहीं आता था कि मैं किस जंजाल में फंस गया हूं।

दिव्या का पक्ष लेता तो मां बुरा मान जातीं, मां का पक्ष लेता तो दिव्या बुरा मान जातीं। और ये दोनों वही औरतें थीं जिनसे इस दुनिया में मैं सबसे ज्यादा प्रेम करता हूं।

एक समय में स्थिति ऐसी आ गई कि मुझे घर पर आने का मन नहीं करता। काम हो गया, मुझे लगता है जितना ज्यादा समय घर से बाहर रहूं, उतना अच्छा है। क्योंकि दो बार समझाने के बाद भी मेरी मां और मेरी पत्नी के बीच विवाद नहीं सुलझा रहा था।

इसी दौरान मैं अपने पापा के साथ उनके पेंशन के काम के लिए ऑफिस जाता हूं और मेरे पापा मुझसे पूछते हैं कि इतना परेशान क्यों रहते हो। मैंने उन्हें बताया कि पापा, यह दिक्कत है। तो पापा ने बोला, “यह तो दुनिया की रीति है, हर मर्द को इससे गुजरना पड़ता है। आज तुम परेशान हो, लेकिन यह चीज कभी खत्म नहीं होगी, तो तुम्हें इसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी।”

“जब मेरी शादी हुई थी तो मैं भी यह चीज झेली है। जब तुम्हारे दादाजी की शादी हुई थी तो उन्होंने भी झेली है। तुम्हारे नाना की शादी हुई थी तो उन्होंने भी झेली है। तो अब तुम्हारी बारी है। लेकिन मैं तुम्हें एक तरीका बताता हूं जिससे हो सकता है कि चीजें काफी हद तक सुधर जाएं।” पापा ने मुझे एक तरीका बताया।

मैं घर आता हूं, चीजें ठीक चलती हैं, लेकिन धीरे-धीरे कुछ समय बाद फिर झगड़ा होना शुरू हो जाता है। इस बार मैंने दोनों को आमने-सामने बैठकर बोला, “लास्ट टाइम मैंने आप लोगों से बात की थी, पर उसका कोई भी मतलब निकाल कर नहीं आ रहा है। यदि आज के बाद फिर घर में कभी झगड़ा होता है तो मैं यह घर छोड़कर चला जाऊंगा। मैं कहीं बाहर रहूंगा और हर महीने की सैलरी आधी मां को और आधी दिव्या को दे दिया करूंगा।”

इस बात का दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

हफ्ता बीतता है और घर में फिर झगड़ा होता है। इस बार समय था एक्शन लेने का। मैं झगड़ा होते हुए देखता हूं, पर इस बार कुछ भी नहीं बोलता। मैं ऑफिस जाता हूं और इस बार देर रात तक ऑफिस में ही रुकता हूं। जब दिव्या मुझे फोन करती है कि आप कहां हैं, तो मैं उनसे बोलता हूं, “मुझे नहीं पता मैं कहां हूं।” कुछ देर बाद मां का फोन आता है और मां भी मुझसे यही पूछती है कि तुम कहां हो, इतना देर क्यों हो रहा है? मैंने मां को भी बोल दिया कि मैं कहां हूं, मुझे भी नहीं पता।

इस दौरान मैं अपने एक अविवाहित दोस्त के घर पर रुका हुआ था, जिसके बारे में मेरे घर में किसी को नहीं पता था, सिर्फ मेरे पिता जानते थे। जब दिव्या का फोन आता है या मां का फोन आता है, तो मैं उनसे नॉर्मली बात करता हूं और उन्हें यह बोल देता हूं कि कई बार मैंने उन लोगों को समझाया है कि घर में लड़ाई झगड़ा मत करो, जिससे घर की शांति भंग होती है। इस वजह से मैं अब घर छोड़कर बाहर आ गया हूं और मैं हमेशा के लिए बाहर हूं।

यह सुनने के बाद मेरी मां घबरा गईं, दिव्या घबरा गईं कि आखिर ऐसा क्या हो गया। और दोनों मुझे फोन करके समय-समय पर यह एहसास दिलाते कि दोबारा उनसे यह गलती कभी नहीं होगी, मुझे जल्दी से जल्दी घर आ जाना चाहिए।

मां ने तो यह तक बोल दिया कि “तू क्या चाहता है, मैं बिना पोते का मुंह देखे मर जाऊं।” और दिव्या फोन करके मुझे यह बोलती कि “आपकी मां आपके लिए बहुत परेशान हैं, मेरे लिए ना सही, कम से कम उनके लिए तो वापस आ जाइए।”

मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही थी कि दोनों लोग मेरे चक्कर में एक-दूसरे के बारे में सोच रहे थे। बस फर्क इतना था कि दिव्या खुलकर के मुझे बोल रही थी, पर मां इशारों में बोल रही थी।

एक हफ्ते बाद मैं घर आता हूं और घर जाकर सबसे पहले देखता हूं और पिताजी से मिलता हूं। पापा मुझे बताते हैं कि एक हफ्ते से घर में काफी शांति है और उम्मीद है आगे भी ऐसा झगड़ा नहीं होगा।

और यकीन मानिए, उस दिन के बाद से ऐसा झगड़ा दोबारा कभी नहीं हुआ। मेरी मां मेरी पत्नी के साथ अच्छे से रहती हैं और मेरी पत्नी मेरे मां के साथ अच्छे से रहती है। आज दिव्या के साथ मुझे पूरे 5 साल हो चुके हैं और हमारा एक बेटा भी है। लेकिन आज हमारे घर में गृहकलह नाम की चीज नहीं है। और इसका पूरा श्रेय मैं अपने पिता को देना चाहता हूं।

क्योंकि उस दिन जब हम पेंशन का काम करने कचहरी गए थे, तो उन्होंने ही मुझे यह आईडिया दिया था कि “तुम एक हफ्ते के लिए घर से बाहर भाग जाओ और बोल देना कि अब तुम दोबारा लौट के कभी नहीं आओगे।”

मुझे पता है मेरा यह कदम काफी ज्यादा हास्यास्पद और कुछ लोगों को बेकार लगे, पर यकीन मानिए, इस चीज ने मेरी जिंदगी बदल दी। अगर मैं आज यह कदम न उठाया होता, तो शायद हर घर की तरह मेरे घर में भी रोज लड़ाई झगड़ा हो रहा होता।

भारत में शादी सिर्फ लड़के और लड़की की नहीं होती, बल्कि लड़की और लड़के की फैमिली की भी होती है। शादी के बाद सिर्फ पत्नी के साथ जी भर के सेक्स करने से खुशी नहीं प्राप्त होती। असली खुशी तब मिलती है जब आपका परिवार भी खुश हो। और परिवार को खुश करने की जिम्मेदारी सिर्फ लड़की की नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की होती है। इसमें