माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रुधे मोय।
इक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूँगी तोय।।

हमें परमात्मा ने सर्वश्रेष्ठ मनुष्य शरीर इसलिए दिया है ताकि स्वांँसों के रहते हुए ध्यान-सुमिरण के अभ्यास से स्वयं को जानकर मनुष्य जीवन को सफल बनाया जा सके।
मिट्टी कुम्हार से बोली : “मुझे पात्र बना दो।”
कुम्हार ने कहा : क्यों?
मिट्टी बोली : ताकि मुझमें पानी रह सके और लोग अपनी प्यास बुझा सकें। इससे मेरा जीवन सार्थक होगा।

मनुष्य जीवन केवल सुख-सुविधाओं के पीछे पागल होकर बर्बाद करने के लिए ही नहीं है।
सुविधायें इस जीवन में प्रगति की सहायक हो सकती हैं, साध्य नहीं।

जीवन का लक्ष्य बहुत ऊंँचा है। अगर छोटी-मोटी सुविधाओं को ही जीवन का सार मान लिया तो अपने इन स्वांँसों के विपुल वैभव को मानव कौड़ियों के भाव गंँवा बैठेगा। इस शरीर रूपी मिट्टी के भीतर स्वांँस आ रहे हैं और जा रहे हैं जिसकी बदौलत इस मिट्टी रुपी शरीर का अस्तित्व है।

इन स्वांँसों के होते अगर इस मिट्टी को पात्र बनाकर हृदय की प्यास नहीं बुझाई तो मनुष्य जीवन अधूरा रहा।
आइंस्टीन ने कहा है कि मेरा अंत:करण कितना छटपटाता है कि मैं कम से कम इतना तो दुनिया को दे सकूंँ – जितना मुझे प्रकृति से विरासत में मिला है।
मनुष्य शरीर के साथ मिली शक्तियों का सही उपयोग तब होगा – जब जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य अपनी आत्मा की पहिचान समय के सद्गुरु की शरण में जाकर आत्म-ज्ञान को जानें! उसका अभ्यास करें! ताकि यह मानव जीवन सार्थक हो जाए!

संत हमेशा यही बतलाते हैं कि स्वयं को जानकर आत्मा के परम-आनन्द के अनुभव से हृदय की प्यास बुझ सकती है।
ध्यान-सुमिरण के अभ्यास से जब भी आप स्वयं अपने अविनाशी को देखेंगे तो आपको विशुद्ध आनन्द की अनुभूति होगी।
सारे संँसाधनों के बावजूद, अगर स्वांँसों के होते हुय, जीते जी स्वयं को नहीं जाना तो फिर इतनी कड़ी मेहनत का क्या अर्थ निकला?*

इसलिय समय के सद्गुरु के मार्गदर्शन में उनके द्वारा प्रदत्त विधि का नियमित अभ्यास करना ही हमारी प्रार्थमिकता होनी चाहिय!
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भक्त को हमेशा अपने गुरुम्हाराजी के प्रति सेवा भाव से केन्द्रित होना चाहिय और वह भी छह कपट से रहित, अनुशासन युक्त!

एक व्यक्ति हनुमानजी के मन्दिर गया उसको कोई सन्तान नहीं थी, उसने हनुमानजी से आराधना की, हे हनुमानजी! आपकी कृपा से सभी दुर्गम कार्य सुगम हो जाते है, “दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते” कृपा करें मुझे एक सुन्दर सा बेटा अगर मिले तो मैं आपको हीरों का हार चढाऊं, पुजारी ने कहा कोई चिंता मत कीजिये हम आपकी ओर से अनुष्ठान करेंगे, पुजारी को भी लोभ था हीरे का हार चढेगा तो अपने को ही मिलेगा।

चालीस दिन का पाठ किया, संयोग से, सौभाग्य से उनकी पत्नी गर्भवती हो गई, निश्चित समय के उपरांत इनको पुत्र रत्न पैदा हो गया, बेटे का नाम रखा हीरालाल। छोटे बच्चों को कोई हीरालाल नहीं बोले, सभी बोले ओ हीरा-हीरा। पुजारी को पता लगा कि सेठजी को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, बडे खुश हुये कि अब तो जरूर हीरे का हार चढेगा। तीन महीने का बालक हो गया, पत्नी ने कहा चलो जी मन्दिर में पूजा कर आएं, मनौती तो पूरी हो गयी, सेठजी बोले रूक अभी बालक को थोड़ा और बड़ा होने दे।

दो साल का हो गया, तो पति ने कहा पाँच वर्ष का हो जाएगा तो मुण्डन के बाद चलेंगे, बालक पाँच वर्ष का हो गया तो पत्नी ने फिर कहा, हमने हनुमानजी के वहाँ जो बोला हुआ है वह पूरा करना है, देवता के सामने मनौती जो रखी जाती है वह पूरी की जाती है अन्यथा अशिष्ट हो सकता है, चलिए न अपने यहाँ कमी किस बात की है, इसी बालक के नाम पर एक हीरे का हार चढाने को कहा है तो वह चढा देते हैं, आदमी तो आदमी है जब तक काम पूरा नहीं होता प्रार्थना के लिए भाव होते हैं, काम पूरा होते ही प्रार्थना के और भाव हो जाते हैं।

पत्नि ने बहुत आग्रह किया तो एक दिन तय हो गया, अच्छा चलो हनुमानजी को हीरे का हार चढाएं, पुजारी को भी समाचार मिल गया, सेठजी आ रहे हैं हीरे का हार चढाने, मन्दिर धोया, चोला चढाया, दीपक और अगरबत्ती जलाई, अब पूजा सब हो गयी, माथा टेक दिया बार-बार पत्नि भी देखे पुजारी भी देखे सेठजी के हीरो का हार, पत्नि ने कहा हीरे का हार चढाओ, लडके के गले में सुन्दर फूलों का हार पहनाकर ले गए थे और वह उतार कर हनुमानजी के चरणों में चढा दिया, बोले यह लो हीरे का हार, बोले क्या मतलब?

बोले हीरा ही तो है लड़का और इसी का हार तो मैं चढा रहा हूँ, गले की माला चढाकर चले गये, भजन में चतुराई, जीवन में चतुराई, दूसरे का पैसा कैसे अपनी जेब में आए इसी चतुराई में हम डूबे है, जो मन के विकारों को छोड़कर भजन में लगा दे वही मन चतुर है, हम लोग उसी को चतुर मानते हैं जो जैसे-तैसे पैसा कमा ले, हम उदाहरण देते हैं देखो वह कितना चतुर व समझदार हैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया।

भक्त को हमेशा अपने गुरुम्हाराजी के प्रति सेवा भाव से केन्द्रित होना चाहिय और वह भी छह कपट से रहित, अनुशासन युक्त!
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अकेले आये थे, अकेले ही जाना है

इस जीवन में कहीं भी रहो – ऐसे रहो जैसे तुम एकान्त में अकेले हो। न कोई साथ है, न कोई साथी। भीड़ में भी रहो तो अकेले रहो। परिवार में भी रहो तो अकेले रहो। हर पल भीतर यह जागरूकता रहे कि तुम अकेले हो।

एक क्षण के लिए भी यह सूत्र हाथ से मत जाने देना। एक क्षण भी यह भ्रान्ति पैदा मत होने देना कि तुम अकेले नहीं हो और कोई तुम्हारे साथ है। यहांँ न कोई साथ है, न कोई साथी हो सकता है। यहांँ सब अकेले हैं।
“मुठ्ठी बाँधे आया जगत में, हाथ पसारे जाना है!”
इसे बदला नहीं जा सकता। थोड़ी-बहुत देर भुलाया जा सकता है लेकिन बदला नहीं जा सकता।
ये सब भुलावे एक तरह के मायावी जाल है। एक प्रकार के नशे हैं। कैसे तुम भुलाते हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। कोई नशे में भुलाता है। कोई धन की दौड़ में पड़कर भुलाता है। कोई पद के लिए दीवाना होकर भुलाता है। इसलिए कैसे भुलाते हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। लेकिन नशे में थोड़ी देर भुला सकते हो बस और जैसे ही नशा उतरेगा वैसे ही अचानक पाओगे कि तुम अकेले हो। सच्चा सन्त, संन्यासी व सच्चे भक्त वही है, जो जानता है कि मैं अकेला हूंँ और अकेले ही जाना है।

स्वांँसों का आने-जाने के सत्य को समझ कर,थोड़ी देर आंँख बन्द करके अपने आप में डूब जाओ! अकेला “अभ्यास” में रम जाओ!
अपने अन्दर संकल्प करो कि मैं “नाम-सुमिरण” का आनन्द लेता रहूँ। यही मेरी नियति है और यही मेरा स्वभाव है। इसी स्वभाव से हमें अपनी पहचान बनानी है। दूसरों से पहचान बनाने से कुछ भी नहीं होगा।अपने से पहचान बनानी है। दूसरों को जानने से क्या होगा? अपने को ही न जाना और सबको जान लिया, इस जानने का कोई मूल्य नहीं है। मूल में तो अज्ञान रह गया।

जब तुम एकान्त में रहोगे और चुप रहोगे तो भीतर विचार कब तक चलेंगे? उनका मौलिक आधार ही कट गया। जड़ ही कट गयी। तुमने पानी सींचना बन्द कर दिया। वही-वही विचार कुछ दिन तक गूंँजेंगे, लेकिन धीरे-धीरे तुम भी ऊब जाओगे और विचार भी ऊब जायेंगे।

रोज-रोज नया कुछ होता रहे तो विचार में धारा बहती रहती है,स्वाँसों का आना-जाना निरन्तर जारी रहता हैं।

अब अकेले में बैठ गये, न बोलना है, न चलना है। कब तक सिर में वही विचार घूमते रहेंगे? धीरे-धीरे मुर्दा हो जायेंगें और गिर जायेंगे। सूखे पत्तों की तरह झड़ जायेंगे और मन निर्विचार होकर स्वांँसों के साथ एकाकार हो जाएगा। उस दशा का नाम ही मुक्ति है, मोक्ष है, शान्ति है।

  • श्री हंस जी महाराज

भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख करै जो काय।

भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख करै जो काय।
शब्द सनेही है रहै, घर को पहुचे सोय।।

अर्थ :- भक्ति के बिना उद्धार होना संभव नहीं है चाहे कोई लाख प्रयत्न करे सब व्यर्थ है। जो जीव सद्गुरु के प्रेमी है, सत्यज्ञान का आचरण करने वाले हैं – वे ही अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।

गुरु को मानुष जानते, ते नार कहिए अन्ध।
होय दुखी संसार मे, आगे जम की फन्द।।

अर्थ :- कबीरदास जी ने सांसारिक प्राणियो को ज्ञान का उपदेश देते हुए कहा है कि जो मनुष्य, गुरु को सामान्य प्राणी (मनुष्य) समझते हैं उनसे बड़ा मूर्ख जगत मे अन्य कोई नहीं है! वह आँखों के होते हुए भी अन्धे के समान है तथा जन्म-मरण के भव-बंधन से मुक्त नहीं हो पाता।

साधु दर्शन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
इक मन्दिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करि लेह।।

अर्थ :- साधु संतों का दर्शन महान फलदायी होता है, इससे करोडो यज्ञों के करने से प्राप्त होने वाले पूण्य फलों के बराबर फल प्राप्त होता है। सन्तो का दर्शन, उनके दर्शन के प्रभाव से एक मन्दिर नहीं, बल्कि पूरा गांव पवित्र और शुद्ध हो जाता है। सन्तों के ज्ञान रूपी अमृत से अज्ञानता का अन्धकार नष्ट हो जाता है।

मात पिता सुत इस्तरी, आलस बन्धू कानि ।
साधु दरश को जब चलै, ये अटकावै खानि ।।

जब आप साधु संतों का दर्शन प्राप्त करने की इच्छा से चलने को तैयार होंगे उस समय माता-पिता, पुत्र-स्त्री, भाई आदि तुम्हें रोकेंगे । ये माया मोह रुपी रिश्ते ही सबसे बडे बाधक है ।

गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट ।
सतगुरु बचन प्रताप सों, मन के मिटे उचाट ।।

गुरु को साक्षात परमेश्वर का रूप जानो और संसारिक विषयों से मुक्ति प्रदान करने वाला गुरुज्ञान, सरोवर का घाट है। ऐसे गुरु के वचनों से मन का सारा सन्देह, सारा कलेश मिट जाता है तथा हृदय शान्त हो जाता है।

ज्ञान की सुगंध

ज्ञान की सुगंध

ज्ञान चन्दन के समान और गुरु वायु के समान है। पूरा चंदन का पेड़ सुगंध से भर जाता है, लेकिन अगर वह अपनी खुशबू को दूर करना चाहता, तो भी नहीं कर पाता। फिर जब हवा चलती है, तो वह सुगंध को पूरे जंगल में ले जाती है। फलस्वरूप अन्य वृक्ष चंदन के वृक्ष के समान सुगंधित हो जाते हैं।
वैसे ही सारा संसार ज्ञान से महकता है, लेकिन गुरु की कृपा रुपी हवा के बिना कोई भी उस आनंद का अनुभव नहीं कर सकता है।

जब गुरु आते हैं तो ज्ञान देते हैं,
और जो इसे प्राप्त करते हैं –
वे तब अपने अन्दर के आनंद का अनुभव करते हैं।

  • श्री हंस जी महराज
    25 दिसंबर 1959
    दनकौर, बुलंदशहर उत्तर प्रदेश
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chandra grahan 2022

साल का यह अंतिम चंद्र ग्रहण 8 नवंबर 2022 को लगेगा. कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगने वाला ये चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. भारतीय समयानुसार, साल का ये अंतिम चंद्र ग्रहण 8 नवंबर 2022 को शाम 5 बजकर 32 मिनट से शुरू होगा और शाम 6 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा.

मेष राशि- चंद्र ग्रहण के चलते मेष राशि के लोगों की मानसिक चिंता में वृद्धि होगी. इस दौरान आप दैनिक रोजगार को लेकर तनाव में आ सकते हैं. दांपत्य और प्रेम संबंधों में टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. इस दौरान आपके माता या पिता को कष्ट हो सकता है. 

वृषभ राशि-  भाई -बंधुओं के बीच तनाव हो सकता है. गृह और वाहन सुख को लेकर भी थोड़ा तनाव हो सकता है. इस दौरान आपको सुख में कमी महसूस होगी और नींद की बीमारी बढ़ेगी. आंतरिक शत्रुओं में वृद्धि होगी लेकिन अंत में जीत आपकी ही होगी. 

कर्क राशि- इस दौरान आपका मन अशांत रहेगा. स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं उत्पन्न होंगी. इस दौरान अकारण तनाव बढ़ेगा. अगर आप कोई डिग्री लेने की सोच रहे हैं तो निर्णय लेने में आपका मन हिचकिचाएगा. इस दौरान माता या पिता को लेकर चिंता की स्थिति बन रही है.  

सिंह राशि- सरकारी या उच्चाधिकारी से तनाव की स्थिति बन रही है. मनोबल और स्वास्थ्य में अवरोध की स्थिति बन रही है. पेट और पैर की समस्याओं में बढ़ोतरी होगी. इस दौरान विवाद से बचें और अपनी वाणी पर संयम बरतें.

कन्या राशि- इस दौरान वाणी की तीव्रता में वृद्धि होगी. ऐसे में इस दौरान किसी से भी संभलकर बात करें. आय के साधनों में तनाव की स्थिति बन रही है. इस दौरान माता के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहे. इसके अलावा सुख में अवरोध की स्थिति पैदा हो सकती है. 

तुला राशि- इस दौरान मानसिक स्वास्थ्य में अवरोध की स्थिति उत्पन्न होगी. माता को किसी कष्ट का सामना करना पड़ सकता है. दांपत्य और प्रेम संबंधों में तनाव की स्थिति उत्पन्न होगी. परिश्रम में भी अवरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. पेट और पैर से जुड़ी समस्याओं के चलते इस दौरान आपका मन अशांत बना रहेगा.

वृश्चिक राशि- मनोबल और स्वास्थ्य को लेकर मन अप्रसन्न रहेगा. इस दौरान आपका मन काफी अशांत रहेगा और आपको हर वक्त ये एहसास होगा कि कुछ हुआ है. इस दौरान आपके खर्चों में वृद्धि होगी. 

धनु राशि- इस दौरान आपका अचानक से क्रोध बढ़ सकता है. ऐसे में जरूरी है कि आप खुद पर नियंत्रण रखें. दांपत्य सुख और प्रेम संबंधों में तनाव की स्थिति भी पैदा हो सकती है. इस दौरान शिक्षा में अवरोध पैदा होगा. माता या पिता को किसी कष्ट का सामना करना पड़ सकता है और संतान को लेकर मन बेचैन बना रहेगा. 

मकर राशि- इस दौरान स्वास्थ्य से संबंधित दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. जीवनसाथी और प्रेम संबंधों को लेकर मन अप्रसन्न रहेगा. आय के साधनों में अवरोध की स्थिति उत्पन्न होगी. संतान को लेकर चिंता लगी रहेगी. माता और पिता के स्वास्थ्य को लेकर भी थोड़ी सी चिंता लगी रहेगी.

मीन राशि- इस दौरान  संतान को लेकर चिंता साथ ही मनोबल में अवरोध उत्पन्न हो सकता है. इस दौरान आपके भाई-बहनों और मित्रों को कष्ट हो सकता है. पराक्रम और सम्मान में अवरोध पैदा होगा. पेट और पेशाब की समस्याओं के कारण तनाव रहेगा. इस दौरान अपनी वाणी पर कंट्रोल रखें.

Chhath (छठ पूजा) 2022

Chhath is an ancient Hindu festival historically native to the Indian subcontinent, more specifically, the Indian states of Bihar, Uttar Pradesh, West Bengal, Jharkhand, and the Nepalese provinces of Madhesh and Lumbini.

छठ पर्व, छइठ या षष्‍ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

Chhath Puja 2022 Date: इस बार छठ पूजा की शुरुआत 28 अक्टूबर को हो रही है और इसका समापन 31 अक्टूबर को हो रहा है. छठ पूजा का पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. यह व्रत सबसे खास माना जाता है|

पूरे दिन निर्जला रहती हैं व्रती

इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला रहती हैं। शाम को गन्ने के रस से तैयार गुड़ से खरना में रसियाव या खीर बनाती हैं। इसे व्रती पूजा करने के बाद ग्रहण करती हैं। इसमें घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है।

सूर्य षष्ठी व्रत कब है?सूर्य षष्ठी व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है. सूर्य षष्ठी व्रत 02 सितंबर 2022 को मनाया जाना है. यह पर्व भगवान सूर्य देव की आराधना एवं पूजा से संबंधित है.

अंधविश्वास भरी बातों की तरफ बिल्कुल ध्यान मत दो और सूर्यग्रहण भी जरूर देखो बस सूर्य की तरफ देखते समय आंखों पर काला चश्मा या कुछ और जरूर लगा लें क्योंकि सूर्य की रोशनी आपकी आंखों पर प्रभाव डाल सकती है

एक राजा बड़ा सनकी था।

एक बार सूर्यग्रहण हुआ तो उसने राजपंडितों से पूछा, ‘‘सूर्यग्रहण क्यों होता है?’’

पंडित बोले, ‘‘राहू के सूर्य को ग्रसने से।’’

राहू क्यों और कैसे ग्रसता है? बाद में सूर्य कैसे छूटता है?’’

पंडितों ने एक से बढ़कर एक कथा सुनाई, किसी ने क्या, किसी ने क्या बताया, सुझाया।

जब उसे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले तो उसने आदेश दिया,

‘‘हम खुद सूर्य तक पहुंचकर सच्चाई पता करेंगे। एक हजार घोड़े और घुड़सवार तैयार किए जाएं।’’

राजा की इस बात का विरोध कौन करे? उसका वफादार मंत्री भी चिंतित हुआ। मंत्री का एक बेटा था वह छोटी उम्र में ही बड़ा होशियार था, विज्ञान और बुद्धि का बेहतरीन इस्तेमाल करता था।

जब बेटे को पिता की चिंता का कारण पता चला तो उसने कहा, ‘‘पिता जी! मैं भी आपके साथ यात्रा पर चलूंगा।’’

पिता, ‘‘बेटा! राजा की आज्ञा नहीं है। तू अभी छोटा है।’’

“नहीं पिता जी! पुरुषार्थ एवं विवेक उम्र के मोहताज नहीं होते है। मैं राजा को आने वाली विपदा से बचाकर ऐसी सीख दूंगा जिससे वह दोबारा कभी ऐसी आज्ञा नहीं देगा।”*

मंत्री, ‘‘अच्छा ठीक है पर जब सभी आगे निकल जाएं, तब तू धीरे से पीछे-पीछे आना।’’

राजा को यही ज्ञान था कि सूर्य तक पहुंचा जा सकता है लेकिन राजा सैनिकों के साथ निकल तो पड़ा पर चलते-चलते काफिला एक घने जंगल में फंस गया। तीन दिन बीत गए। भूखे-प्यासे सैनिकों और राजा को अब मौत सामने दिखने लगी। हताश होकर राजा ने कहा, ‘‘सौ गुनाह माफ हैं, किसी के पास कोई उपाय हो तो बताओ।’’

मंत्री, *‘‘महाराज! इस काफिले में मेरा बेटा भी है। उसके पास इस समस्या का हल है। आपकी आज्ञा हो तो…’’

‘‘हां-हां, तुरंत बुलाओ उसे।’’

राजा मंत्री का बेटा हाजिर होकर बोला, ‘‘महाराज! मुझे पहले से पता था कि हम लोग रास्ता भटक जाएंगे क्योंकि आपने राजपण्डितों के चक्कर मे आकर गलत निर्णय लिया। आपके जानने, समझने के स्रोत पूर्णतः गलत थे इसीलिए सबसे पहले हम घर कैसे पहुंचे उसके लिए मैं अपनी प्रिय घोड़ी को साथ लाया हूं। इसका दूध-पीता बच्चा घर पर है। जैसे ही मैं इसे लगाम से मुक्त करूंगा, वैसे ही यह सीधे अपने बच्चे से मिलने के लिए भागेगी और हमें रास्ता मिल जाएगा।’’

ऐसा ही हुआ और सब लोग सकुशल राज्य में पहुंच गए।

राजा ने पूछा, बेटे! तुमको कैसे पता था कि हम राह भटक जाएंगे और घोड़ी को रास्ता पता है? यह युक्ति तुम्हें कैसे सूझी?’’*

‘‘राजन! सूर्य हमसे करोड़ों कोस दूर है और कोई भी रास्ता सूरज तक नहीं जाता। तमाम गप्पें केवल मनुष्यों को मूर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई हैं। एक समय हमारे पास सच तक पहुंचने के साधन नहीं थे तब यह सत्य लगते थे लेकिन आज सत्य सामने हैं और सत्य को ठुकरा कर असत्य को सत्य मान बैठे हैं अत: कहीं न कहीं फंसना स्वाभाविक था।’’

दूसरा, ‘‘पशुओं की भी अपनी योग्यता है कि वे कैसी भी अनजान राह में हों उन्हें अपने घर का रास्ता ज्ञात होता है। उनका मस्तिष्क याददाश्त के मामले में हमसे कहीं बेहतर होता है।

तीसरा, ‘‘समस्या बाहर होती है, समाधान भीतर होता है। जहां बड़ी-बड़ी शास्त्र व लोग काम करना बंद करते हैं वहां विज्ञान व सच्चा गुरु ज्ञान ही मनुष्य का उद्धार कर सकते हैं। आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’

‘‘नि:संकोच कहो।’’

‘‘यदि आप अपने जानने, समझने के स्रोत को ठीक कर दो तो आने वाली पीढ़ी तर्कशील और प्रगतिशील बनेंगी अन्यथा जिंदगी भर, पीढ़ी दर पीढ़ी झूठ के सहारे जीती रहेगी। जागृति से प्रजा भी उन्नत होगी, जिससे राज्य में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ेगी।’’

राजा उसकी बातों से बहुत प्रभावित हुआ, बोला, ‘‘मैं तुम्हें एक हजार स्वर्ण मोहरें पुरस्कार में देता हूं और आज से अपना सलाहकार मंत्री नियुक्त करता हूं। अब भी अपने राज्य में उन्नत शिक्षा को जीवन में लाऊंगा।’’

इस घटना से आपको आज 21 जून को लगने वाले सूर्यग्रहण के विषय मे समझना होगा। 21 जून यानी उत्तरी ध्रुव में सबसे बड़ा दिन। आज ही इस साल का सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण भी लग रहा है सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण एक सामान्य सी (नेचुरल) घटना है जो सौरमंडल बनने के बाद अब तक लगातार जारी है।

यह तो आजकल स्कूल की पांचवी कक्षा की किताबों में ही बता दिया जाता है कि जब सूर्य और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है।

शुरू में मनुष्य इन आकाशीय घटनाओं को लेकर आशंकित रहा होगा क्योंकि उनके बारे में इसे कोई ज्ञान नहीं था. लेकिन विज्ञान और टेक्नोलॉजी की तरक्की के साथ इन आकाशीय घटनाओं के बारे में मनुष्य के विचार में बदलाव आता गया और इस प्रकार उनका इन घटनाओं से डरने की भावना धीरे-धीरे समाप्त होती गई।

इसके विपरीत भारत में इन आकाशीय घटनाओं से लोगों में अभी भी डर व्याप्त है। लोगों में डर फैलाने की अहम भूमिका ज्योतिषी निभा रहे हैं क्योंकि यह घटनाएं उनको मोटी कमाई करने का अवसर प्रदान करती हैं।

यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे समाज में लोग अभी भी अंधविश्वास से ग्रस्त हैं, ऐसे तो यह अंधविश्वास और भी बहुत से देशों में है, लेकिन भारत में कुछ ज्यादा ही है। कल सुबह से ही बहुत सारे ज्योतिष शास्त्री या हमारे न्यूज़ चैनल या दूसरे धार्मिक चैनल एडवाइजरी देने शुरू कर देंगे कि हमें कब क्या करना है, कब खाना खाना है, कब पानी पीना है, कब पानी भरना है, और कब खाना बनाना है, किस पर ग्रहण का क्या प्रभाव पड़ेगा।

गर्भवती महिलाओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इससे बचने के लिए हमें कौन से दान करने हैं, कैसा पूजा पाठ करना है, ग्रहण समाप्त होने तक बस यह सब ड्रामा चलता रहेगा और हमारी मूर्ख जनता भी इन बातों को को सच मानकर इन बातों का अनुसरण करती रहेगी, बहुत सारे लोग तो शायद ग्रहण समाप्त होने तक नहीं खाना बनाएंगे और ना ही खाएंगे कुछ तो शायद पानी भी नहीं पिएंगे।

इसलिए इन अंधविश्वास भरी बातों की तरफ बिल्कुल ध्यान मत दो और सूर्यग्रहण भी जरूर देखो बस सूर्य की तरफ देखते समय आंखों पर काला चश्मा या कुछ और जरूर लगा लें क्योंकि सूर्य की रोशनी आपकी आंखों पर प्रभाव डाल सकती है वह चाहे आप सूर्य ग्रहण के समय देखो या बिना सूर्य ग्रहण के समय बाकि यह सब खगोलीय घटनाएं हैं जिनका किसी होनी-अनहोनी से कोई लेना देना नहीं होता है, न राहु-केतु जैसा कोई ग्रह है, न पूजा, पाठ, दान, दक्षिणा से इसमें ककी फर्क पड़ने वाला है। कभी इन ढोंग फैलाने वाले चैनल्स को छोड़कर डिस्कवरी या अन्य साइंस फिक्शन चैनल्स व प्रोग्राम जरूर देखिये तथा जाग्रत एवं उन्नत बनिये। धन्यबाद।

सूर्य ग्रहण 25th October 2022, evening

Things To Buy On Dhanteras 2022

  • Poverty will be removed by buying a broom
  • Wealth increases by the purchase of metals (gold and silver)
  • Purchase of vehicle and land is also auspicious
  • Happiness comes from the purchase of lamp and lit it.
  • Buying utensils is also auspicious

ईर्ष्या

ईर्ष्या में जलने वाला व्यक्ति अपनी खुशियों को भी जला डालता है। किसी की उन्नति, वैभव को देखकर ईर्ष्या मत करो क्योंकि आपकी ईर्ष्या से दूसरों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर आपकी प्रवृत्ति जरूर बिगड़ जाएगी। किसी दूसरे की समृद्धि या उसकी किसी अच्छी वस्तु को देखकर यह भाव आना कि यह इसके पास न होकर मेरे पास होनी चाहिए थी, बस इसी का नाम ईर्ष्या है।

        ईर्ष्या सीने की वो जलन है, जो पानी से नहीं अपितु सावधानी से शांत होती है। ईर्ष्या की आग बुझती अवश्य है किन्तु बल से नहीं अपितु विवेक से। ईर्ष्या वो आग है जो लकड़ियों को नहीं अपितु आपकी खुशियों को ही जला डालती है।

         अत: संतोष और ज्ञान रूपी जल से इसे और अधिक भड़कने से रोको ताकि आपके जीवन में खुशियाँ नष्ट होने से बच सकें। जलो मत, साथ- साथ चलो, क्योंकि खुशियाँ जलने से नहीं अपितु सदमार्ग पर चलने से मिला करती है।

   🙏🌹 राम राम 🌹 🙏