जब भी वह समय के महापुरुष के चरणों में जाये उसको कभी भी डिमाण्ड और कमांड की इच्छा त्याग देनी चाहिय!

जब तक व्यक्ति के भीतर पाने की इच्छा शेष है, तब तक उसे दरिद्र ही समझना चाहिए।
श्री सुदामा जी को गले लगाने के लिए आतुर श्री द्वारिकाधीश इसलिए भागकर नहीं गए कि सुदामा के पास कुछ नहीं है अपितु इसलिए गए कि सुदामा के मन में कुछ भी पाने की इच्छा अब शेष नहीं रह गयी थी।।

इसलिए ही संतों ने कहा है कि जो कुछ नहीं माँगता उसको भगवान स्वयं अपने आप को दे देते हैं।

द्वारिकापुरी में आज सुदामा राजसिंहासन पर विराजमान हैं और कृष्ण समेत समस्त पटरानियाँ चरणों में बैठकर उनकी चरण सेवा कर रही हैं। सुदामा अपने प्रभाव के कारण नहीं पूजे जा रहे हैं अपितु अपने स्वभाव और कुछ भी न चाहने के भाव के कारण पूजे जा रहे हैं।।

सुदामा की कुछ भी न पाने की इच्छा ने ही उन्हें द्वारिकापुरी के सदृश भोग ऐश्वर्य प्रदान कर दिया। मानो कि भगवान ये कहना चाह रहे हों कि जिसकी अब और कोई इच्छा बाकी नहीं रही वो मेरे ही समान मेरे बराबर में बैठने का अधिकारी बन जाता है।

मनुष्य की निष्कामता अथवा कामना शून्यता ही उसे अबसे अधिक मूल्यवान,अनमोल और उस प्रभु का प्रिय बना देती है।
जिसके जीवन में कामना नहीं होती उसे दु:खों का सामना भी नहीं करना पड़ता है।
जिसमें डिमांड नहीं होती वो ही डायमंड होता है!
इसलिय भक्त को याद रखना चाहिय कि –
जब भी वह समय के महापुरुष के चरणों में जाये उसको कभी भी डिमाण्ड और कमांड की इच्छा त्याग देनी चाहिय!
और शरणागत भाव से सेवा करते हुए उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान का अभ्यास करना चाहिय!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

क्रोध एक सार्वभोमिक तकलीफ

क्रोध एक सार्वभोमिक तकलीफ

क्रोध से कोई अछूता नहीं है! संतों ने इसका वर्णन अनेक तरीके से किया है और इससे दूर रहने की सलाह भी हम एक दुसरे को देते हैं पर जब अपनी बारी आती है तो हमारी उस क्रोध न करने की समझ का अक्सर अपहरण हो जाता है और अनायास ही हम इस क्रोध के शिकार हो जाते हैं!

अमूमन हम यही देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति क्रोध कर लेता है, तब सभी लोग उसे कहते हैं कि “भाई, आपको क्रोध नहीं करना चाहिए!”
उस समय ऐसे शब्द सुनकर वह क्रोधित व्यक्ति अपमान का अनुभव करता है और अपना अपमान किसी को अच्छा नहीं लगता।

इस कारण से, उस अपमान से बचने के लिए, अपने सम्मान की रक्षा के लिए और अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए, वह व्यक्ति क्रोध आने के ‘कारण’ गिनाने लगता है, कि “उस व्यक्ति ने मुझे ऐसा ग़लत ग़लत कहा, जिस कारण से मुझे क्रोध आया।”

इस प्रकार से वह, क्रोध करने के बाद भी अपने दोष को स्वीकार नहीं करता, बल्कि सारा दोष दूसरे व्यक्ति के सिर पर डाल देता है। और कहता है कि “यदि वह ऐसा मुझे नहीं कहता, तो मैं क्रोध क्यों करता? इसलिए मेरी कोई गलती नहीं है, सारा काम उसने ही बिगाड़ा है।”

परंतु वास्तविकता यह है कि “कोई भी व्यक्ति जब क्रोध करता है – तब यह तो ठीक है कि क्रोध करने का कोई न कोई कारण तो होगा ही।”
यदि बैठे बिठाए बिना कारण के कोई व्यक्ति क्रोध करे, तब तो लोग उसे ‘पागल’ ही समझेंगे और उसे पागलखाने में पहुंचा देंगे। इसलिए बिना कारण तो कोई व्यक्ति क्रोध नहीं करता! “जब भी क्रोध आता है, तो उसका कोई न कोई कारण तो होता ही है।”

परंतु यह बात इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया।”
महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि “जब क्रोध आ गया, तब क्रोधित होकर आपने कोई ग़लत क्रिया कर दी या आपने भी कुछ उल्टा सीधा बोल दिया! तब उसका जो परिणाम निकला – क्या वह परिणाम अत्यंत हानिकारक नहीं होता है? क्या आप वह हानि उठाना चाहते हैं?”

उत्तर यही होगा कि कोई नहीं चाहेगा। लेकिन आवेग में तो वह नुकसान हो चूका!

इसलिए क्रोध आने के कारण नहीं गिनाने चाहिय कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया। उस कारण से क्रोध आया।”
क्रोध के कारण गिनाने मात्र से आप क्रोध से होने वाली हानि से बच नहीं पाएंगे। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि “यदि आप क्रोध की हानियों से बचना चाहते हों तो अपने मन और वाणी पर संयम रखें। स्वयं अपने आप पर संयम रखें।” यही समाधान है, क्रोध से बचने का।

अपने मन और वाणी पर संयम कैसे रखें? स्वयं अपने आप पर संयम कैसे रखें?

इसका उपाय है, “अपनी इच्छाओं/अपेक्ष्याओं पर नियंत्रण करें। आप लोगों से जितनी इच्छा और अपेक्षया कम रखेंगे, उतना ही आप क्रोध से बच जायेंगे और जितनी इच्छाएं और अपेक्ष्याओं को बढ़ाएंगे, उतना ही आप अधिक क्रोधित होंगे।”

क्योंकि क्रोध तभी आता है, जब आपकी इच्छा पूरी नहीं होती! और सारी इच्छाएं किसी व्यक्ति की कभी भी पूरी हो नहीं सकती। ऐसे तो सदा ही सबको क्रोध आता ही रहेगा। उसको कभी कोई व्यक्ति जीत ही नहीं पाएगा!”

बनने वाले ने हमारे अंदर दोनों प्रकार की चीजें डाली हैं –
पहली कि सुख की चाहत हमारी जन्मजात प्रक्रति बनायी और सात गुण – पवित्रता, शांति, शक्ति, प्यार, खुशी, ज्ञान और गंभीरता के रूप में दिए!

दूसरा, पांच तरह के विकार भी हम सभी में विद्यमान हैं – जिन्हें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार कहा गया है!

अब यह हमारे विवेक पर छोड़ दिया गया है कि अपना ध्यान किस ओर दें और किस चीज का ज्यादा इस्तेमाल करें! स्वाभाविक हैं कि जिसका हम अधिक अभ्यास, चिन्तन-मनन करेंगे उसी में पारंगत होंगे!

जिन लोगों को समय के सद्गुरु का सानिध्य मिलता है और जब वे उन्हें आत्मबोध कराते हैं तो इन पांच विकारों का मुकाबला ही नहीं इनका समन भी किया जाता सकता है! कयोंकि खाली क्रोध नहीं करना चाहिय यह एक सुन्दर बात है पर इसका निराकरण तो समय के महापुरुष का सानिध्य और मार्गदर्शन ही है! हम आरती में रोज गाते भी हैं कि –
काम क्रोध मद मत्सर चोर बड़े भारे!
ज्ञान खडग दे कर में गुरु सब संहारे!!

पांच चोर के मारण कारण नाम का बाण दिया!
प्रेम भक्ति से साधा, भव जल पार किया!!
सभी गुरुभक्तों के लिय खुशखबरी यही है कि महाराजी की कृपा से हमें इन पंच-विकारों से मुक्ति पाने की युक्ति मिली हुई है! अब हर एक भक्त पर निर्भेर करता है कि हम अपना झुकाव किस तरफ करें! जिस किसी ने इस युक्ति को समझ लिया और प्रेमभक्ति से अपने विकारों को दूर करने का अनवरत अभ्यास किया तो जीवन में आनन्द ही आनन्द है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

हम और हमारी अंतरात्मा?

हम और हमारी अंतरात्मा?

हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि “हम खुद को ही नहीं जानते”, शायद हम अपनी प्रकृति या मूल स्वभाव को ही नहीं जानते या फिर शायद जानते हुए भी अनजान है।

जिस तरह हमें पता है कि पानी का स्वभाव तरल होता है, उसी तरह क्या हमें पता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है? क्या है हमारा मूल स्वभाव….आत्म बोध….

हर व्यक्ति के अन्दर एक शांत शक्ति मौजूद है- जिसे हम अपनी अंतरआत्मा कहते हैं। यह अंतरात्मा हर परिस्थति में सही होती है। यह अंतरात्मा हमेशा हमें सही रास्ता दिखाती है।

जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते है, तब हमें अपने ही अन्दर से बड़ा अजीब सा लगता है जैसे कोई यह कह रहा कि वह कार्य मत करो। यह हमारे अन्दर मौजूद आतंरिक शक्ति ही होती है जो हमें बुरा कार्य करने से रोकती है।

यह भी कहा जाता है कि हर मनुष्य के अन्दर ईश्वर का अंश होता है, यह ईश्वर का अंश हमारी अंतरआत्मा ही होती है।

बनाने वाले ने हमारी प्रकृति या स्वभाव में – शांत, शक्ति, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, ज्ञान, सद्भाव, दूसरों की सहायता और अच्छा करने की भावना डाली है।

हर मनुष्य के अन्दर यह शांत और अद्भुत शक्ति मौजूद है, चाहे वह एक अपराधी हो या संत या और कोई व्यक्ति।
लेकिन फिर क्यों एक संत सही मार्ग पर चलता है और अपराधी गलत मार्ग पर?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है लेकिन अपराधी को वह आवाज अब सुनाई नही देती।

दरअसल जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है।

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है।

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती।

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है। हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है।

समय के सदगुरु हमारा यही मार्गदर्शन करते हैं कि हम अपने अन्दर की आवाज को सुनें! इसके लिय बाहर के शोर को बंद करना होगा!
🙏🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏🙏

दिमाग एक खजाना है जिसमे हम प्यार,

दिमाग़ कचरे का डब्बा नहीं, जिसमें हम क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान और जलन रखें…!
दिमाग एक खजाना है जिसमे हम प्यार, सम्मान, ज्ञान, विज्ञान, मानवता, दया जैसी बहुमूल्य चीजें रख सकते हैं…!!
ताक़त आवाज़ में नहीं अपने विचारो में रखिए क्योंकि फ़सल बारिश से होती है, बाढ़ से नहीं…….!!
आपका दिन शुभ एवम मंगलमय हो……!!

. सुप्रभात,………..

जीवन का राजपथ

जीवन का राजपथ

जीवन के पथ पर हमें सुंदर उपवन भी मिलते हैं
और कँटीली झाड़ियाँ भी।
सुख सागर में हम गोते खाते हैं ;
तो कभी दुःख का तूफान हमें भयभीत करता है!
कभी की सुषमा हमें मनोहारी दृश्य दिखाती है;
तो कभी पतझड़ का परिवेश, हमारे हृदय को कष्ट देता है।
जीवनयात्रा का यह पथ कभी सुरम्य घाटियों से होकर गुजरता ;
तो कभी ऊबड़-खाबड़ दुर्गम रास्तों से।|

दुर्गम रास्तों से गुजरते समय, कभी-कभी पथ को छोटा करने के लिए यात्री छोटी-छोटी पगडंडियाँ बना लेते हैं।
इनमें से कुछ पगडंडियाँ तो रास्ते को छोटा करती हैं, पर कुछ मात्र भटकावा बनकर रह जाती हैं।

जीवन-पथ पर भी ऐसी पगडंडियाँ बहुत हैं, जो दिखती तो छोटी हैं और ऐसा आभास भी देती हैं कि वे मार्ग तक पहुँचा देंगी, पर वो कहीं भी पहुँचाती नहीं हैं।

दुःख के क्षणों में मनुष्य ऐसी भूल अक्सर कर बैठते हैं, जब वे छोटे व सरल रास्ते के लालच में मुख्य मार्ग को छोड़कर कहीं और की यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

💐जीवन का मुख्य मार्ग, जीवन का राजपथ धर्म का मार्ग ही है। 💐सुख आए अथवा दुःख, इस राजमार्ग को छोड़ने की भूल हमें कभी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि अंतत: गंतव्य तक पहुँचाने का कार्य मात्र राजपथ ही करता है।

पाप, पतन, अनीति का मार्ग शीघ्र सफलता का स्वप्न जरूर दिखाता है, परंतु पहुँचाता कहीं भी नहीं है। हमारी चाहतें शीघ्रातिशीघ्र पूरी हो जाएँ, इस लालच में लोग धर्म व सदाचार का पथ छोड़कर अपूर्ण महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए निकल जरूर पड़ते हैं, परंतु वो पथ मात्र कीचड़ भरे दलदल में पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता।

धर्म का पथ समयसाध्य हो, समय के महापुरुष का मार्गदर्शन हो, उनकी आज्ञा का पालन करने का मन में संकल्प हो, हमारा जीवन कर्तव्यों से परिपूर्ण है – वही जीवन का राजमार्ग है; उस पर चलते हुए जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है व श्रेयस्कर भी!
🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

अनवरत सेवा, सतसंग और भजन-अभ्यास करने से

अनवरत सेवा, सतसंग और भजन-अभ्यास करने से
आपको जीवन के प्रति व्यापक और उदार दृष्टिकोण प्राप्त होगा।
आप अकेलेपन में भी एकता का अनुभव करने लगेंगे।
अंतत: आप आत्मज्ञान के पथ पर आगे बढ़ते ही रहेंगे!
आपको “सभी में एक” और “एक में सभी” का एहसास होगा।
और आप असीम आनंद का अनुभव करेंगे।
रामायण का यह अद्भुत प्रसंग गहरी समझ देता है –
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।

जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।।
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही।।

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।।
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।।
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।

जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।।
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी।।

निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।

जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।।
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।

आपका आज का दिन आनन्दमय हो!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Prem Rawat Quote

Use the strength of knowing to climb the mountains of ignorance.
अज्ञानता के पहाड़ों पर चढ़ने के लिए ज्ञान की शक्ति का उपयोग करें। -Prem Rawat

Take account of your true strengths.
अपनी असली ताकत का हिसाब लें। -Prem Rawat

वास्तविकता क्या है और हमारे हृदय की आवश्यकता क्या है; उन्होंने इस विषय पर ध्यान केंद्रित करने का प्रोत्साहन दिया। संशय की प्रकृति पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि संशय कैसे चिंता और भय की ओर ले जाता है। उन्होंने व्यक्त किया कि हमें अपने हृदय को स्पष्ट रखना सीखना चाहिए अन्यथा संदेह होगा।

श्री प्रेम रावत जी ने स्वीकार किया कि जीवन हमेशा सरल नहीं होता है, किन्तु इस जीवन के लिए स्वयं को कृतज्ञता से भरना याद रखना चाहिए। जब तक हम जीवित हैं, तब तक सब कुछ ठीक है, और हम अपनी क्षमता पर भरोसा कर सकते हैं।

हमारा लक्ष्य : टेक्नोलॉजी और ऐसी चीजें जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाती है, उन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय हमें स्वयं के संपर्क में रहना चाहिए ।
श्री प्रेम रावत जी ने साझा किया कि “समय के चोर” के विरुद्ध सचेत होना ही एकमात्र सुरक्षा प्रणाली है क्योंकि जो समय वो हमसे चुरा लेता है – उससे हम दोबारा पा नहीं कर सकते।”

“When you feel small, when you feel weak, remember who you are. You’re powerful.” – Prem Rawat

“Maybe we cannot change the world, but we can definitely feel the peace that is inside of us”. – Prem Rawat

The challenge is to remember what is important every moment.
चुनौती यह याद रखना है कि हर पल में क्या महत्वपूर्ण है। -Prem Rawat

Learn to recognize the important things in your life every day.
हर दिन अपने जीवन में महत्वपूर्ण चीजों को पहचानना सीखें।
-Prem Rawat

Today Thought

‘अंधेरा’
नाम की कोई चीज नहीं है!
यह तो
केवल प्रकाश की अनुपस्थिति की परिणीति है!

इसी तरह
‘समस्या’
नाम की कोई चीज नहीं है!

यह केवल
समाधान के लिए
एक विचार का अभाव है!
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
आपकी सकुशलता व अच्छी सेहत की कामना के साथ आपको सुप्रभात
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

संसार में जितने जीव हैं- सबके शरीर के अंदर आत्मा है! जिसके कारण जीव सजीव और क्रियाशील है।

भारतीय वेदान्त ज्ञान बतलाता है कि केवल मनुष्य शरीर से ही आत्मा को जाना जा सकता है और आत्मा को जानकर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, उसके समस्त विषय- विकार मिट जाते हैं, समस्त क्लेश मिट जाते हैं और जीते जी स्वर्ग की अनुभूति करने लगता है!

वास्तव में यही है – मानव जीवन मिलने का परम उद्देश्य।

किसी सुभाषितकार ने बड़ा अच्छा कहा है-
पढ़े छहो शास्त्र अठारह पुराण पढ़े,
वेद उपवेद आदि अंत कोई छाना है।
गीता रामायण स्रुति स्मृति पढ़े,
सांख्य न्याय योग आदि दर्शन भी जाना है।।

जाना है बनाना छन्द सोरठा चौपाई को,
जाना ध्रुपद का राग और भैरवी का गाना है।
इतना जो जाना सोई खाक धूल छाना है।।

जाना है सोई जिन आतम पहिचाना है।।

ध्यान देने की बात है कि आदि काल से मानव मात्र के लिय यह आत्मज्ञान वाला संदेश आज भी प्रासंगिक एवम् अनुकरणीय है!

हम महापुरुषों के जन्म दिन तो मनाते हैं और उन्हें मानते भी हैं लेकिन जो वह कहते है उसे नहीं मानते! उनके संघर्षों को आत्मसात नहीं करते और ना ही उनके संदेशों का पालन करते हैं!

जरा सोचें, यह कहाँ तक सही है?
कम से कम आज जन्माष्टमी के दिन जब सारी दुनिया श्री कृष्ण का जन्म दिन मना रही है –
क्या कभी किसी ने उनको जन्म देने वाली माता देवकी के दर्द को महसूस किया होगा कि किस प्रकार वह अपने सगे भाई कंस के द्वारा प्रताड़ित की गयी और वह भी तब, जब वह समय के महापुरुष श्री कृष्ण की जन्मदात्री कहलाती हैं! शायद नहीं!

क्या कभी किसी ने विचार किया कि श्री कृष्ण जी ने संसय-युक्त मानव को क्या संदेश दिया? जो गीता के रूप में आज भी मौजूद है!

क्या हमने भी अपने आप को अर्जुन-कृष्ण सम्बाद में समस्याओं से घिरे अर्जुन की तरह कनफूज होने पर – समय के महापुरुष की खोज करके आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिशा में कदम बढाया?

महापुरुषों का संदेश साफ़ है –
नाना शास्त्र पठेन लोके नाना दैवत पूजनम!
आत्म ज्ञान बिना पार्थ सर्व कर्म निरर्थकम्!!

तो देर किस बात की? और इंतज़ार किसका?
अज्ञानता की मोह निद्रा से उठकर ज्ञान के आलोक में अर्जुन की तरह वह विधि सीखिय जिसमें कृष्ण ने बतलाया कि अर्जुन, तू युद्ध करते हुए सुमिरन कर!

खुशी की बात यह है कि आज भी आत्मबोध करने वाले, मनुष्य के जीवन में जीते जी शांति का बोध कराने वाले सद्गुरु मौजूद हैं!

बस, जरूरत हमारे चाहत की है कि हमारे अन्दर वह ज्ञान पाने की प्रबल जिज्ञासा है या नहीं!

हमेशा से समय के सच्चे संत महापुरुष बतलाते हैं कि सदाचार का पालन करते हुए समय के सदगुरु के पास जाकर आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिय! यही मानव जीवन की उपादेयता है।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।

शायद गीता का यह संदेश मनुष्य के कल्याण के लिय पर्याप्त है – यदि वह अनुशरण करना चाहे!

आप सबको पुनश्च श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामनाएं!
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻