Trikara Pain Go, 30 g

इस आइटम के बारे में

Trikara Pain Go एक प्रभावी ऑइंटमेंट है, जिसे शरीर के विभिन्न दर्द जैसे पीठ दर्द, मोच, खिंचाव और मांसपेशियों की जकड़न से तेज़ और लंबे समय तक राहत देने के लिए तैयार किया गया है।
इसका विशेष फॉर्मूला त्वचा के भीतर गहराई तक जाकर दर्द वाले हिस्से को आराम पहुंचाता है और मांसपेशियों की अकड़न को कम करने में मदद करता है।


मुख्य सामग्री

विंटरग्रीन ऑयल (Gaultheria fragrantissima oil)

  • मिथाइल सैलिसिलेट से भरपूर, जो प्राकृतिक दर्द निवारक की तरह कार्य करता है।
  • इसके एंटी-इन्फ्लेमेटरी और दर्द कम करने वाले गुण मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द को कम करने में मदद करते हैं।

पुदीना सत्व (Mentha piperita Satva)

  • पेपरमिंट से प्राप्त, यह ठंडक का एहसास देकर दर्द वाली मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है।
  • रक्त संचार को बेहतर बनाने और हल्के दर्द व ऐंठन से राहत देने में सहायक।

कपूर सत्व (Camphora officinarum Satva)

  • कपूर अपने गर्माहट देने वाले गुणों के लिए जाना जाता है, जो जकड़न और सूजन को कम करने में मदद करता है।
  • यह मांसपेशियों की असुविधा कम कर स्थानीय रक्त प्रवाह को बेहतर बनाता है।

नीलगिरी तेल (Eucalyptus globulus oil)

  • एंटी-इन्फ्लेमेटरी और सूजन कम करने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध।
  • मांसपेशियों और जोड़ों की सूजन व जकड़न को शांत करने में मदद करता है।

टरपेंटाइन ऑयल

  • पाइन रेजिन से प्राप्त, यह रक्त प्रवाह बढ़ाने में सहायक होता है।
  • गहरे मांसपेशीय दर्द और सूजन को कम करने में मदद करता है।

अजवाइन सत्व (Ptychotis Ajowan Satva)

  • आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता है।
  • इसके एंटी-इन्फ्लेमेटरी और दर्द निवारक गुण मांसपेशियों के खिंचाव और जोड़ों के दर्द में राहत देते हैं।

फायर नीडल ऑयल (Abies alba oil)

  • सिल्वर फर पेड़ों से प्राप्त यह तेल गर्माहट और उत्तेजना प्रदान करता है।
  • तनावग्रस्त मांसपेशियों को आराम देकर दर्द कम करने में सहायक।

पाइन ऑयल (Pinus Sylvestris Oil)

  • एंटीसेप्टिक और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुणों से भरपूर।
  • मांसपेशियों के दर्द को शांत कर ऊतकों की रिकवरी में मदद करता है।

तेजपत्ता तेल (Cinnamomum Tamala Oil)

  • एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल गुणों के लिए जाना जाता है।
  • दर्द और सूजन को कम करने में सहायक।

जायफल तेल (Myristica Fragrans Houtt Oil)

  • नसों और मांसपेशियों पर गर्माहट और आरामदायक प्रभाव डालता है।
  • ऐंठन, जोड़ों के दर्द और मांसपेशियों की थकान से राहत देने में उपयोगी।

मुख्य विशेषताएँ

  • दर्द से राहत: दर्द और असुविधा को कम करने में सहायक।
  • लंबे समय तक असर: लंबे समय तक आराम प्रदान करता है।
  • गहराई तक असर: प्रभावित हिस्से में गहराई तक जाकर कार्य करता है।
  • मांसपेशियों को आराम: जकड़न कम करने में मददगार।
  • सूजन कम करने में सहायक: जोड़ों के दर्द और मोच से होने वाली सूजन को कम करता है।
  • उपयोग में आसान: आसान एप्लिकेशन के लिए ट्यूब पैक में उपलब्ध।
  • पोर्टेबल: कहीं भी साथ ले जाने और उपयोग करने में सुविधाजनक।

उपयोग करने का तरीका

  1. आवश्यक मात्रा में ऑइंटमेंट ट्यूब से निकालकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं।
  2. हल्के हाथों से लगाएं, ज्यादा रगड़ें नहीं।
  3. ऑइंटमेंट को त्वचा में अवशोषित होने दें और आराम महसूस करें।

इसे क्यों चुनें?

निर्माण प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की निगरानी में सभी गुणवत्ता और स्वच्छता मानकों का पालन किया जाता है।


अतिरिक्त जानकारी

  • शेल्फ लाइफ: निर्माण तिथि से 36 महीने तक उपयोग के लिए उपयुक्त।
  • इन्फोग्राफिक्स केवल उदाहरण के उद्देश्य से हैं।
  • स्टोरेज: ठंडी और सूखी जगह पर रखें। सीधे सूर्य प्रकाश से दूर रखें।

source : https://www.rcmworld.com/product/trikara-pain-go-30-g-20000662

Nutricharge S5

इस आइटम के बारे में

प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान और आधुनिक सुविधा का अनोखा संगम है — Nutricharge S5
प्रकृति की पाँच सबसे भरोसेमंद जड़ी-बूटियों — ब्लैकसीड (कलौंजी), तुलसी, नीम, एलोवेरा और स्पीयरमिंट — से तैयार यह खास फॉर्मूला आपके लिए लाता है संपूर्ण हर्बल देखभाल।

हर जड़ी-बूटी अपने आप में खास है, लेकिन जब ये साथ आती हैं तो बनती हैं एक शक्तिशाली वेलनेस कॉम्बिनेशन।

इम्यूनिटी बढ़ाने, त्वचा को साफ और स्वस्थ रखने, हृदय स्वास्थ्य को सपोर्ट करने और ब्लड शुगर संतुलित रखने में Nutricharge S5 आपकी रोज़ाना की हर्बल शक्ति बन सकता है।

जब पाँच शक्तियों का लाभ एक साथ मिल सकता है, तो सिर्फ एक क्यों चुनें?
महसूस करें प्रकृति की ताकत। महसूस करें Nutricharge S5 का असर।


मुख्य सामग्री

Nigella sativa (कलौंजी)

कलौंजी में 100 से अधिक फाइटोकेमिकल तत्व पाए जाते हैं, जिनमें आवश्यक फैटी एसिड की भरपूर मात्रा शामिल होती है।

तीन प्रकार की तुलसी

इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में सहायक।
ब्लड ग्लूकोज, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड स्तर को कम करने में मदद कर सकती है तथा अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

Azadirachta indica (नीम)

नीम अपने एंटीवायरल और एंटीबैक्टीरियल गुणों के कारण इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करने में मदद करता है।

Aloe barbadensis (एलोवेरा)

एलोवेरा में एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायरल और एंटीफंगल गुण पाए जाते हैं तथा यह घाव भरने की प्रक्रिया को तेज करने में सहायक माना जाता है।

Mentha spicata (स्पीयरमिंट / पुदीना)

स्पीयरमिंट में एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो त्वचा की सुरक्षा में मदद करते हैं। इसमें एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण भी पाए जाते हैं।


मुख्य विशेषताएँ

  • 5-इन-1 हर्बल ब्लेंड – ब्लैकसीड (कलौंजी), नीम, एलोवेरा, तुलसी और स्पीयरमिंट का मिश्रण
  • ट्रिपल तुलसी पावर – 3 शक्तिशाली तुलसी वेरिएंट्स शामिल
  • हाई-पोटेंसी एक्सट्रैक्ट्स – 100 mg नीम एक्सट्रैक्ट + 5g एलोवेरा जेल
  • प्लांट-बेस्ड – शाकाहारी लोगों के लिए उपयुक्त, स्वच्छ और जागरूक विकल्प
  • USA पेटेंटेड टेक्नोलॉजी

सेवन करने का तरीका

  • रोज़ाना भोजन के बाद 1 कैप्सूल लें या स्वास्थ्य विशेषज्ञ के निर्देशानुसार सेवन करें।
  • 18 वर्ष से अधिक आयु के लोग इसका सेवन कर सकते हैं।
  • प्लांट-बेस्ड डेली वेलनेस चाहने वाले लोगों के लिए उपयुक्त।

इसे क्यों चुनें?

निर्माण प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की निगरानी में सभी गुणवत्ता और GMP मानकों का पालन किया जाता है।


अतिरिक्त जानकारी

  • स्टोरेज: सीधे सूर्य प्रकाश से दूर, ठंडी और सूखी जगह पर रखें।
  • शेल्फ लाइफ: निर्माण तिथि से 18 महीने तक उपयोग के लिए उपयुक्त।
  • इन्फोग्राफिक्स केवल उदाहरण के उद्देश्य से हैं।

source : https://www.rcmworld.com/product/nutricharge-s5-20004054

Nutricharge Woman

इस आइटम के बारे में

Nutricharge Woman विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए तैयार किया गया है जो संतुलित और पोषण-समृद्ध जीवनशैली अपनाना चाहती हैं।
इसमें 50 सावधानीपूर्वक चुने गए पोषक तत्वों का मिश्रण है, जिनमें आवश्यक विटामिन, मिनरल्स, अमीनो एसिड और फलों व पौधों से प्राप्त प्राकृतिक अर्क शामिल हैं। यह आपके व्यस्त आधुनिक जीवन के साथ आसानी से फिट होकर रोज़मर्रा की वेलनेस को सपोर्ट करता है।

इसका स्वादिष्ट स्ट्रॉबेरी फ्लेवर और 100% शाकाहारी फॉर्मूलेशन इसे आपकी दैनिक आदत का एक आसान और आनंददायक हिस्सा बनाता है।
चाहे आप ऑफिस की जिम्मेदारियाँ निभा रही हों, घर और स्वास्थ्य का ध्यान रख रही हों या खुद के लिए थोड़ा समय निकाल रही हों — यह डेली टैबलेट हर कदम पर आपका वेलनेस साथी है।


मुख्य सामग्री

आयरन (Iron)

स्वस्थ हीमोग्लोबिन स्तर बनाए रखने में मदद करता है।

विटामिन C

एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट जो संक्रमण से लड़ते समय बनने वाले फ्री रेडिकल्स से कोशिकाओं की रक्षा करता है।

फोलेट (Folate)

नई लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) के निर्माण में सहायक।

जिंक (Zinc)

इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में मदद करता है।

विटामिन B12

मस्तिष्क के सामान्य कार्य और नई RBCs के निर्माण में सहायता करता है।

मोलिब्डेनम (Molybdenum)

एंजाइम कार्य और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को सपोर्ट करता है।

सेलेनियम (Selenium)

अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों तथा बाल, नाखून और इम्यून सिस्टम को स्वस्थ बनाए रखने में भूमिका के लिए जाना जाता है।


मुख्य विशेषताएँ

  • हीमोग्लोबिन स्तर बढ़ाने में सहायक
  • मासिक धर्म से पहले होने वाली असुविधा (PMS) को कम करने में मददगार
  • बाल, त्वचा और नाखूनों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक
  • ऊर्जा और स्फूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकता है
  • हड्डियों और जोड़ों के संपूर्ण स्वास्थ्य को सपोर्ट करता है

सेवन करने का तरीका

  • रोज़ाना 1 टैबलेट 200 ml पानी के साथ लें
  • नाश्ते के बाद सेवन करना बेहतर माना जाता है
  • उपयोग से पहले स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें

इसे क्यों चुनें?

निर्माण प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की निगरानी में सभी गुणवत्ता और GMP मानकों का पालन किया जाता है।


अतिरिक्त जानकारी

  • इन्फोग्राफिक्स केवल उदाहरण के उद्देश्य से हैं।
  • सभी मासिक धर्म वाली किशोरियों और महिलाओं के लिए अनुशंसित।
  • स्टोरेज: सीधे सूर्य प्रकाश से दूर, ठंडी और सूखी जगह पर रखें।
  • शेल्फ लाइफ: निर्माण तिथि से 18 महीने तक उपयोग के लिए उपयुक्त।

source : https://www.rcmworld.com/product/nutricharge-woman-20004030

Nutricharge Glycem Tab

इस आइटम के बारे में

क्या आप बढ़े हुए ब्लड शुगर लेवल को लेकर चिंतित हैं?
अब नियंत्रण पाएं Nutricharge Glycem Tab के साथ।

Nutricharge Glycem Tab प्रकृति की शक्ति और वैज्ञानिक शोध का बेहतरीन मिश्रण है, जो प्री-डायबिटीज और डायबिटीज से जुड़े बढ़े हुए ब्लड शुगर लेवल को कम करने में सहायता करता है।
यह अस्वस्थ लिपिड लेवल और कोशिकाओं को होने वाले नुकसान जैसी समस्याओं से भी लड़ने में मदद करता है, जिससे आपका शरीर अंदर से सुरक्षित रहता है।

प्री-डायबिटीज एक चेतावनी संकेत है, जहाँ ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है लेकिन अभी डायबिटीज नहीं बना होता। अच्छी बात यह है कि इसे सही जीवनशैली और सपोर्ट के साथ नियंत्रित किया जा सकता है — और Nutricharge Glycem इस बदलाव में आपका साथ देता है।


मुख्य सामग्री

Mangifera indica (आम)

आम में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो असामान्य ग्लूकोज के कारण बनने वाले हानिकारक तत्वों को कम करने में मदद करते हैं।

Gymnema sylvestre

यह थकान को कम करने में मदद करता है, जो उच्च ब्लड शुगर का एक सामान्य लक्षण है।

Emblica officinalis (आंवला)

आंवला अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने और खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में सहायक माना जाता है।

Glycyrrhiza glabra (मुलेठी)

यह इंसुलिन रेजिस्टेंस को कम करने और ग्लूकोज संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है। साथ ही यह एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि बढ़ाकर कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाने में सहायक है।


मुख्य विशेषताएँ

  • ब्लड शुगर कम करने और समग्र स्वास्थ्य सुधारने के लिए क्लिनिकली टेस्टेड
  • प्राकृतिक तत्वों से भरपूर, जो स्वस्थ ब्लड शुगर स्तर को सपोर्ट करने के लिए जाने जाते हैं
  • बेहतर पोषक तत्व अवशोषण और प्रभावशीलता के लिए विशेष रूप से तैयार फॉर्मूला

सेवन करने का तरीका

  • रोज़ सुबह 1 टैबलेट चबाएं
  • बेहतर परिणाम के लिए Nutricharge GlycemProDiet शेक के साथ सेवन करें
  • अपनी दैनिक वेलनेस रूटीन का नियमित हिस्सा बनाएं
  • 18 वर्ष से अधिक आयु के वे लोग जिनका ब्लड शुगर स्तर 140 mg/dl से अधिक है, इसका सेवन कर सकते हैं

इसे क्यों चुनें?

  • निर्माण प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की निगरानी में सभी गुणवत्ता और GMP मानकों का पालन किया जाता है।
  • Chew-and-Go सुविधा – पानी की जरूरत नहीं, बस चबाएं और आगे बढ़ें।

अतिरिक्त जानकारी

  • इन्फोग्राफिक्स केवल उदाहरण के उद्देश्य से हैं।
  • शेल्फ लाइफ: निर्माण तिथि से 24 महीने तक उपयोग के लिए उपयुक्त।
  • स्टोरेज: सीधे सूर्य प्रकाश से दूर, ठंडी और सूखी जगह पर रखें।
  • एलर्जन जानकारी: इसमें सोया, नट्स और दूध के अंश हो सकते हैं।
  • गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं अथवा किसी मेडिकल समस्या से ग्रस्त व्यक्ति सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह लें।

नोट:

जो लोग डायबिटीज की दवाइयाँ ले रहे हैं, वे इस उत्पाद का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लें ताकि हाइपोग्लाइसीमिया (ब्लड शुगर का अत्यधिक कम होना) से बचा जा सके।

source : https://www.rcmworld.com/product/nutricharge-glycem-tab-20004016

In This Era of AI, Do Not Stop Thinking

एआई के इस दौर में सोचना न छोड़ें

एआई के दौर में हर काम एक क्लिक में पर हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई पर बढ़ती निर्भरता हमारी सोचने की क्षमता पर बुरा असर डाल सकती है। साइकोलॉजी टुडे में छपे एक लेख लेखक जॉन नोस्टा ‘एक्टिविटीज ऑफ डेली थिंकिंग’ को अपनाने पर जोर देते हैं। उनके अनुसार, स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए दिमागी घर्षण यानी दिमागी कसरत जरूरी है।

जिस तरह चिकित्सा के क्षेत्र में ‘एक्टिविटीज ऑफ डेली लिविंग’ से पता लगाया जाता है कि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से अपने काम करने में कितना स्वतंत्र है, वैसे ही ‘एक्टिविटीज ऑफ डेली थिंकिंग’ से अपनी स्वतंत्र मानसिक सोच बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

कैसे करें दिमागी कसरत

पढ़ें : कुछ पढ़ते समय कोई शब्द या वाक्य समझ न आने पर तुरंत एआई की मदद न लें। खुद से समझने की कोशिश करें, उस कठिनाई का अनुभव करें। अलग-अलग स्रोत से अर्थ खोजें, इस प्रक्रिया में कई नई चीज पता चलती है। लिखेंः लिखने की प्रक्रिया में हम खुद को, अपनी समझ की गहराई को जानते हैं। अगर आप एआई से ही लिखवाएंगे, तो आप खुद को नहीं समझ पाएंगे। निर्णय लें: छोटे-छोटे फैसलों के लिए एआई की सलाह लेना बंद करें। अपनी पसंद और समझ के आधार पर चुनाव करना शुरू करें।

तर्क-वितर्क करें: एआई से मदद लेते समय हम तुरंत अंतिम समाधान तक पहुंच जाते हैं। इससे असहमति व्यक्त करने की क्षमता कम हो सकती है। स्वयं से कुछ देर तर्क-वितर्क करें। ठहरें: किसी कठिन सवाल से घबराएं नहीं, उस पर विचार करने के लिए तैयार रहें। उस असहजता को महसूस करें। हमारी असली सोच उसी असहजता के बाद शुरू होती है।

In the age of AI, nearly every task is being accomplished with just a single click. According to experts, our growing reliance on AI could have a detrimental effect on our cognitive abilities. In an article published in Psychology Today, author John Nosta advocates for the adoption of “Activities of Daily Thinking.” According to him, “mental friction”—that is, mental exercise—is essential for cultivating independent thought.

Just as “Activities of Daily Living” are used in the medical field to assess an individual’s physical independence in performing daily tasks, “Activities of Daily Thinking” can help individuals maintain their independent mental faculties.

How ​​to Exercise Your Mind

Read: When reading, if you encounter a word or sentence you do not understand, do not immediately turn to AI for help. Try to decipher it yourself; embrace the challenge. Seek out the meaning from various sources; this process often reveals many new insights. Write: The act of writing allows us to gain a deeper understanding of ourselves and the depth of our own comprehension. If you rely solely on AI to do your writing, you will fail to truly understand yourself. Make Decisions: Stop seeking AI’s advice for minor decisions. Begin making choices based on your own preferences and judgment.

Engage in Deliberation: When we rely on AI for assistance, we often arrive at a final solution instantly. This can diminish our capacity to express disagreement or engage in debate. Take some time to deliberate and reason things out on your own. Pause: Do not be intimidated by a difficult question; instead, be prepared to contemplate it. Embrace that sense of discomfort. Our true thinking—our deepest insights—often begins only after we have navigated through that very discomfort.

When Can a Newborn Baby See and Hear? Complete Parent Guide

Welcoming a newborn baby is a beautiful experience, but it also brings many questions—especially about your baby’s senses. One of the most common questions parents ask is: “When can my baby see and hear?”

In this guide, we’ll explain everything in simple terms so you can understand your baby’s development stage by stage.


👶 Can Newborn Babies Hear?

Yes, babies can hear from birth.

What happens at birth?

  • A newborn’s hearing is already developed.
  • Babies can recognize their mother’s voice immediately.
  • Loud sounds may startle them (this is normal).

Development Timeline:

  • 0–1 Month: Reacts to loud sounds, may blink or jump.
  • 1–2 Months: Starts recognizing familiar voices.
  • 3–4 Months: Turns head toward sounds.
  • 6 Months: Responds clearly to voices and sounds.

Signs of Healthy Hearing:

  • Startles at loud noise
  • Calms when hearing parents’ voice
  • Turns head toward sound (after 2–3 months)

👀 Can Newborn Babies See?

Yes, but their vision is not fully developed at birth.

What can they see?

  • Babies see blurry images at first.
  • Best focus distance is 20–30 cm (8–12 inches).
  • They prefer faces and high-contrast objects.

Vision Development Timeline:

  • 0–1 Month: Blurry vision, sees light and shapes
  • 2 Months: Starts focusing on faces
  • 3 Months: Tracks moving objects
  • 4–6 Months: Vision becomes clearer and more coordinated

🧠 How Parents Can Support Development

For Hearing:

  • Talk to your baby frequently
  • Sing lullabies
  • Use gentle sounds and toys

For Vision:

  • Maintain eye contact
  • Show black-and-white or colorful toys
  • Move objects slowly to help tracking

⚠️ When to Be Concerned?

Consult a doctor if:

Hearing Issues:

  • No reaction to loud sounds by 2 months
  • Does not respond to voices

Vision Issues:

  • No eye contact by 3 months
  • Doesn’t track moving objects

Early detection helps ensure proper development.


✅ Final Thoughts

  • Babies can hear from birth
  • Babies can see from birth, but vision improves over time
  • Major development happens in the first 6 months

Every baby grows at their own pace, but understanding these milestones helps you support their development better.

Eat for Your Health

सेहत के लिए खाइए

सदियों से यह लगातार दोहराया जाता रहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। आपके स्वास्थ्य पर सबसे अधिक असर इस बात का पड़ता है कि आप क्या खा रहे हैं?

भोजन के बारे में हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि कुछ खास तरह का भोजन पचाने के लिए हमारा पाचन तंत्र जहां क्षार पैदा करता है, वहीं कुछ अन्य प्रकार के भोजन के लिए यह अम्ल पैदा करता है। यदि आप कई तरह का भोजन एक साथ कर लेते हैं, तो आपका पेट भ्रम में पड़ जाता है और क्षार के साथ अम्ल भी पैदा करने लगता है। ये दोनों एक-दूसरे के असर को समाप्त कर देते हैं। इससे हमें पाचन रसों का लाभ नहीं मिल पाता है। इसके कारण भोजन पेट में आवश्यकता से अधिक समय तक बना रहता है और कोशिकीय स्तर पर ऊर्जा प्राप्त करने की हमारी क्षमता कमजोर पड़ जाती है। इससे ऊर्जा प्रणाली में जड़ता भी पैदा होती है, जिसे हम ‘तमस’ कहते हैं। यदि यह लंबे समय तक रहे, तो आपके गुणों पर असर होने लगता है, और यह न केवल आप क्या हैं बल्कि आप क्या बन सकते हैं, उस पर भी प्रभाव डालता है।

प्राचीन काल से ही, दक्षिण भारत में लोग इस बात का खास ध्यान रखते थे कि कुछ खास व्यंजनों को आपस में न मिलाया जाए। किंतु आजकल, भोजन का महत्व शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रह ही नहीं गया है, यह एक सामाजिक मामला बन गया है। लोग जब भोज में खाते हैं, तब शरीर को पोषण देने से अधिक चर्चे इस बात के होते हैं कि कितनी तरह के व्यंजन लगाए गए ? सवाल यह नहीं कि क्या नहीं खाएं, बल्कि मुद्दा यह है कि क्या खाएं और कितनी मात्रा में खाएं? यह नैतिकता का नहीं, बल्कि जीवन की समन का विषय है। शहरी जीवन से जूझने के दौरान आपको चुस्त-दुरुस्त दिमाग की जरूरत पड़ती है। साथ शरीर और मन के बीच एक संतुलन रखना पड़ता है। यही नहीं, आप में से कुछ की आध्यात्मिक आकांक्षा चाहे बरसों में एक बार ही उसकी इच्छा जगे।) भी होर है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना संतुलित भोजा तय करना चाहिए, किंतु इसके लिए उसे कोई शाथ लेने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह निरीक्षण और सागरूकता से किया जाना चाहिए।

यह महत्वपूर्ण है कि आप भोजन कोनिकर झक्की न बन जाएं। आप हर समय भोजन के पीछे ही लगे हुए हैं- इसको ऐसा कोई मुद्दा न बनाएं। इसधरती का हर जीव जानता है कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। फिर समस्या क्या है? आपकी समया यह है कि आप भरपूर ध्यान नहीं देते, बजाय उरके ढेर सारी जानकारियां बटोर लेते हैं।

इस धरती का हर जीव जानता कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या नह। फिर समस्या क्या है? समस्या यह है कि आप भरपूर ध्यान नहीं देते, बजाय उसके ढेर सारी जानकारियां बटोर लेते हैं।

For centuries, it has been consistently reiterated that a healthy mind resides only in a healthy body. The single greatest influence on your health is—what you eat.

Regarding food, one thing we must keep in mind is that while our digestive system generates alkaline substances to digest certain types of food, it produces acids for others. If you consume a wide variety of foods simultaneously, your stomach becomes confused and begins generating both alkaline substances and acids. These two counteract and neutralize each other’s effects. Consequently, we fail to derive the full benefit from our digestive juices. As a result, food remains in the stomach for longer than necessary, and our capacity to extract energy at the cellular level becomes compromised. This also induces a state of inertia within the energy system—a state we refer to as ‘Tamas.’ If this persists over a prolonged period, it begins to impact your inherent qualities; it influences not only who you currently are but also who you have the potential to become.

Since ancient times, people in South India have taken particular care to ensure that certain specific dishes are not combined with one another. However, in the modern era, the significance of food is no longer limited to merely maintaining a healthy body; it has evolved into a social phenomenon. When people attend feasts or banquets, the conversation revolves less around nourishing the body and more around the sheer variety of dishes that have been served. The question is not merely what not to eat; rather, the central issue is what to eat and in what quantity? This is not a matter of morality, but rather a matter of life management. As you navigate the challenges of urban life, you require a sharp and agile mind. Furthermore, it is essential to maintain a delicate balance between the body and the mind. Moreover—even if the desire arises only once every few years—some of you harbor spiritual aspirations as well. Therefore, every individual should determine their own balanced diet; however, one need not seek external scriptures or dogmas to do so—instead, this should be achieved through careful observation and conscious awareness. It is important that you do not become a food fanatic. Do not make food the sole focus of your existence—do not turn it into such a major issue. Every living being on this planet knows what it should and should not eat. So, what is the problem? Your problem is that you do not pay sufficient attention; instead, you merely gather a vast amount of information.

Every living being on this planet knows what it should and should not eat. So, what is the problem? The problem is that you do not pay sufficient attention; instead, you merely gather a vast amount of information.

How to Handle Yourself in Stressful Moments

तनाव के पलों में खुद को कैसे संभालें

अक्सर मुसीबत और तनाव के पलों में हमारी अच्छी आदतें भी साथ छोड़ने लगती हैं। हम खुद को कोसते रहते हैं। ऐसे पलों में हमें खुद को स्वीकारने की जरूरत होती है। हम जहां हैं, जैसे हैं, वहां सहज होना ही हमें आगे बढ़ाता है।

  1. क्क्त की जरूरत समझें

हम अक्सर अपनी छोटी-मोटी भूलों, जैसे- मोटर बंद करना भूल जाना या चाबियां खो देना आदि के लिए खुद को कोसते रहते हैं। साइकोलॉजी टुडे के लेख में लेखिका एलिस बॉयस कहती हैं, ‘ये गलतियां हमेशा आपकी लापरवाही या आलस का नतीजा नहीं होतीं। ऐसा मानसिक थकान के कारण भी हो सकता है। तनाव के पलों में ऐसी गलतियां और बढ़ जाती हैं।

क्या करें: यह स्वीकार करें कि आप कुछ कारणों से पहले से बहुत थके हुए हैं। रोज के अनुशासन को बनाए रखने की जिद न करें। खुद के प्रति सख्त न बनें। अपने मानसिक बोझ को कम करने पर ध्यान दें।

  1. इच्छाशक्ति की सीमा स्वीकारें

व्यवहार मनोविज्ञान में ‘हैबिट स्टैकिंग’ (एक पुरानी आदत के साथ नई आदत जोड़ना) बहुत लोकप्रिय है, लेकिन जब आपकी मानसिक ऊर्जा कम होती है, तो यह तकनीक भी फेल हो जाती है। एक काम के साथ दूसरा काम जोड़ना आपके बोझ को और बढ़ा देता है।

क्या करें: कठिन समय में बड़े जोखिम उठाने के बजाय ‘नुकसान कम’ करने पर ध्यान दें।

  1. खुदस मी से पेश आएं

मनोवैज्ञानिक क्रिस्टिन नेफ कहती हैं, ‘खुद की कमियां जानना अच्छी बात है, पर हर समय खुद को कोसते रहना हमें पंगु बना देता है। अगर आपकी बनाई हुई व्यवस्था या योजना फेल हो रही है, तो खुद को कोसने के बजाय एक दयालु ‘मॅटोर’ की तरह सोचें।’

क्या करें : सुधार को एक घटना नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया मानें। हर चीज को अपनी व्यक्तिगत हार न बनाएं।

  1. सब परफेक्ट हो, जरूरी नहीं

अक्सर हम छोटी-छोटी समस्याओं पर बहुत सारी ऊर्जा और संसाधन खपा देते हैं। मामूली समस्याओं को जटिल ढंग से सुलझाते हैं या फिर एक परफेक्ट समाधान ढूंढ़ने के चक्कर में कुछ करते ही नहीं। ऐसे में वे काम जो हम कर सकते थे, वे भी अधूरे रह जाते हैं। जब आप किसी निर्णय को लेकर दुविधा में हों और ‘सर्वश्रेष्ठ’ नहीं चुन पा रहे हों, तो सोचने का तरीका बदलना जरूरी हो जाता है। किसी काम को टालते रहना सबसे बुरा विकल्प है। इससे बेहतर है कि आप एक औसत दर्जे का कदम उठा लें।

क्या करें: तनाव के पलों में अपने जरूरी काम पर ध्यान दें। चीजों को सुलझाने पर अपना फोकस बनाएं। सबसे खराब विकल्पों को सूची से हटाते हुए जो सबसे बेहतर समझ आए, उसके साथ काम को निपटाते हुए आगे बढ़ें.।

Often, in times of trouble and stress, even our good habits begin to leave us. We tend to blame ourselves. In such moments, we need to accept ourselves. Being comfortable with where we are and how we are is what propels us forward.

  1. Understand the Need for Time

We often blame ourselves for small mistakes, such as forgetting to turn off the car or losing our keys. In an article for Psychology Today, author Alice Boyce says, “These mistakes aren’t always the result of carelessness or laziness. They can also be caused by mental fatigue. Such mistakes are exacerbated during stressful times.”

What to Do: Accept that you’re already very tired for some reason. Don’t insist on maintaining daily discipline. Don’t be harsh on yourself. Focus on reducing your mental burden.

  1. Accept the limits of willpower

‘Habit stacking’ (adding a new habit to an old one) is very popular in behavioral psychology, but this technique also fails when your mental energy is low. Adding one task to another only increases your burden.

What to do: Focus on minimizing losses during difficult times rather than taking big risks.

  1. Be kind to yourself

Psychologist Kristin Neff says, “It’s good to know your shortcomings, but constantly berating yourself paralyzes us. If a system or plan you’ve created fails, instead of berating yourself, think of yourself as a compassionate mentor.”

What to do: Think of improvement as an ongoing process, not a single event. Don’t make everything a personal defeat.

  1. Everything doesn’t have to be perfect

We often expend a lot of energy and resources on small problems. We either overcomplicate small problems or, in our pursuit of a perfect solution, avoid doing anything altogether. Consequently, even the tasks we could have accomplished remain incomplete. When you’re in a dilemma and can’t choose the “best,” it’s essential to change your thinking. Procrastinating is the worst option. It’s better to take a mediocre approach.

What to do: During stressful times, focus on the important tasks at hand. Focus on solving things. Eliminate the worst options from your list and proceed with the best one.

There are several types of diabetes.

डायबिटीज के कई प्रकार

टाइप-1: इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम ही इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को खत्म कर देता है। यह अक्सर बचपन में शुरू होती है। ज्यादातर आनुवंशिक होती है।

टाइप-2 : खराब जीवनशैली से होने वाली डायबिटीज । इसमें शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। भारत में इसके मामले सबसे अधिक होते हैं।

टाइप-1.5 इसे ‘मिक्स्ड डायबिटीज’ समझें। शुरुआत में यह टाइप-2 जैसी दिखती है, पर धीरे-धीरे मरीज पूरी तरह इंसुलिन पर निर्भर हो जाता है। यह वयस्कों में होती है।

जेस्टेशनल (गर्भावस्था में): यह केवल प्रेग्नेंसी के दौरान होती है। हालांकि, डिलीवरी के बाद यह ठीक हो जाती है। भविष्य में टाइप-2 का खतरा बढ़ सकता है।

नियोनेटल : बेहद दुर्लभ । जन्म के पहले 6 महीनों में दिखने वाली यह समस्या 4 लाख में से किसी एक बच्चे को होती है।
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टाइप-3सीः जब पैनक्रियाज में पुरानी सूजन या तब इंसुलिन और पाचन एंजाइम्स दोनों की कमी हो जाती है।

टाइप-3 : यह दिमाग में इंसुलिन की गड़बड़ी से जुड़ी है, जो आगे चलकर ‘अल्जाइमर’ का कारण बन सकती है।

टाइप-5 : यह उन लोगों को होती है, जो बहुत दुबले-पतले हैं। पोषण की कमी के कारण उनके शरीर में इंसुलिन बनना कम हो जाता है।

Type 1: In this, the body’s immune system destroys insulin-producing cells. It often begins in childhood and is mostly genetic.

Type 2: Diabetes caused by a poor lifestyle. In this, the body cannot use insulin properly or does not produce enough insulin. It has the highest incidence in India.

Type 1.5: Consider this “mixed diabetes.” Initially, it resembles type 2, but gradually the patient becomes completely insulin-dependent. It occurs in adults.

Gestational (pregnancy): This occurs only during pregnancy. However, it resolves after delivery. The risk of developing type 2 may increase in the future.

Neonatal: Extremely rare. This condition occurs in one in 400,000 babies, appearing in the first six months of life.

Type 3C: When there is chronic inflammation of the pancreas or a deficiency of both insulin and digestive enzymes.

Type 3: This is associated with insulin imbalance in the brain, which can lead to Alzheimer’s.

Type 5: This occurs in people who are very thin. Lack of nutrition reduces insulin production in their bodies.